हिंदी साहित्य के इतिहास

हिंदी साहित्य के इतिहास आदिकाल का वर्णन इसी पोस्ट में आपको पढ़ने को मिलेगा जिस प्रकार की जनकारी इस पोस्ट में बताई गई वह और कहीं आपको देखने को नहीं मिलेगा दोस्तों।

हिंदी साहित्य के इतिहास के बारे में मैंने आपको मेरे ब्लॉग के पहले ,पोस्ट में बताया था और आज मैं अपने ब्लॉग के इसी पोस्ट को लेकर दूसरा पोस्ट लिखा हूँ जिसमें मैंने आपको बताया है हिंदी साहित्य के आदिकाल के बारे में यह हिंदी साहित्य का बहुत ही महत्वपूर्ण काल है क्योकि इसे ही हिंदी साहित्य का प्रारंभिककाल के नाम से भी जाना जाता है लेकिन इसमें भी बहुत कुछ समस्याएं हैं। 

दोस्तों जैसे के मैंने आपको अपने पिछले पोस्ट में बताया है की हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन इतना सरल नहीं रहा है यह बहुत ही कठिनाई का सामना करते हुये लिखा गया है। तो आदिकाल ही वह समय है जिसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण आज भी अनुपस्थित है और शायद अनुस्पस्थित ही रहे तो जानते हैं आदिकाल के बारे में विस्तार से क्या होता है आदिकाल क्या क्या नाम दिए गए आदिकाल के हिंदी साहित्य में। 

हिंदी साहित्य में आदिकाल क्या है ?


आदिकाल हिंदी साहित्य का प्रारम्भिक समय है जिस समय हिंदी साहित्य का प्रादुर्भाव हुआ माना जाता है। इस काल में ऐसी रचनाएँ हुई जिनका कोई ग्रामर नहीं था अर्थात बिना नियम के जो रचना हुए वो आदिकाल के अंतर्गत आते हैं।

आदिकाल का इतिहास 


आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी के अनुसार हिंदी साहित्य का इतिहास मनुष्य की या जनता की चित्तवृत्ति का ही इतिहास है।  जनता की चित्तवृत्ति में परिवर्तन के साथ ही साहित्य के  स्वरूप में परिवर्तन देखने को हमें मिलता है। ऐसा आचार्य रामचंद्र शुक्ल का कहना है। आचार्य के अनुसार जनता की चित्तवृत्ति का निर्माण तत्कालीन  परिस्थितियों से होता है। अतः उनका यह भी मानना रहा है की साहित्य के इतिहास का अध्ययन तत्कालीन परिस्थितियों के संदर्भ किया जाना चाहिये। 

आचार्य शुक्ल ने यह स्वीकार किया है की जिस काल खंड में किसी विशेष प्रवृत्ति की प्र्धानता हो, उसे अलग कालखंड माना जाए। प्रवृत्ति का निर्धारण उस काल में पाई जाने वाली प्रसिद्ध पुस्तकों के आधार पर की जानी चाहिए। इसी आधार पर उन्होंने प्रथम कालखंड में वीरगाथा की प्रवृत्ति प्रधान मानते हुए इस काल का नाम वीरगाथा काल रखा। इस प्रकार शुक्ल जी की काल विभाजन पध्दति के दो आधार हैं - (1) प्रधान प्रवृत्ति (2) ग्रंथों की प्रसिद्धि। 

रामचंद्र शुक्ल के अनुसार जब हम किसी काल का नाम रखते हैं तब उस कालखंड में प्रधान प्रवृत्ति के साथ-साथ अन्य प्रवित्तियाँ भी मुख्य रूप से होते हैं लेकिन हमें काल के नाम का निर्धारण प्रधान प्रवृत्ति के आधार पर किया जाना चाहिए। 
तो यहां पर स्पष्ट है की आदिकाल को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य का वीरगाथा काल का नाम दिया है। 

उन्होंने हिंदी साहित्य को मुख्य रूप से तीन भागो में बांटा है लेकिन मध्यकाल को और  दो भाग में बाँट दिया है जिसके कारण चार भाग हो जाते हैं। 

इनके द्वारा किया गया काल विभाजन इस प्रकार से है -


आदिकाल (वीरगाथा काल- संवत 1050 - 1375 वि.)
पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल- सम्वत 1375 - 1700 वि.)
उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल - संवत 1700 - 1900 वि.)
आधुनिक काल (गद्यकाल - संवत 1900 - 1984 वि.)

यहां जो कोष्टक में नाम दिए गए हैं उसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल के द्वारा स्वीकार किया गया है। प्रारम्भ में दिया गया नाम यह सूचित करता है की लोगों के द्वारा प्रारम्भिक काल का नाम आदिकाल कहना उचित है लेकिन आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार इसे वीरगाथा काल कहना उचित माना गया है। क्योकि इस काल में वीरता से भरी घटनाएं हुई थी और आचार्य परिस्थिति के आधार पर नामकरण को उचित मानते हैं। 

चुकी आचार्य रामचंद्र शुक्ल के द्वारा किया गया काल विभाजन हमेशा से ज्यादा मान्यता प्राप्त रहा है इस कारण मैं यहां पर इनके आदिकाल के नामकरण के लिए क्या दृष्टिकोण थे उसे आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। 
आचार्य रामचंद्र शुक्ल का इस संबंध में कथन इस प्रकार है - राजा भोज की सभा में खड़े होकर राजा की दानशीलता का लम्बा-चौड़ा वर्णन करके लाखों रुपये पाने वाले कवियों का समय बित चूका था। राज दरबारों में  शास्त्रार्थियों की भी वह धूम नहीं रह गयी थी। पांडित्य के चमत्कार पर पुरस्कार का विभाजन भी ढीला पड़ गया  था।  इस समय जो भाट या चारण किसी राजा के पराक्रम विजय, शत्रु-कन्या-हरण आदि का अत्युक्तिपूर्ण आलाप करता था या रण-क्षेत्र में वीरों के हृदय में उत्साह की तरंगें भरा करता था, वहीं सम्मान पाता था। 

हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन के समय अलग अलग लेखकों का काल विभाजन का नाम अलग अलग रखा गया और तर्क भी प्रस्तुत किये गए। जिसके कारण हमेशा से भ्रान्ति रही है इतिहास विभाजन के नामकरण में। 

आदिकाल के नामकरण 


हिंदी साहित्य के आरम्भिक काल का नामकरण इस प्रकार है-

प्रस्तावना - 

1. हिंदी साहित्य का प्रथम काल यानी की प्राम्भिक काल -

आदिकाल का प्रादुर्भाव रणभेरी के तुमुलनाद यानी की युद्धों के समय से हुआ है तथा शस्त्रों की प्रबल झंकार भी उस समय देखने को मिलता है। अगर राजनितिक दृष्टि से इस काल को देखें तो यह बहुत ही उथल पुथल का काल रहा है। इसी समय विदेशी आक्रमण का सूत्रपात हुआ। देश की सुव्यवस्था के छिन्न-भिन्न हो जाने के कारण सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति अत्यंत शोचनीय थी। एक साथ अनेक धर्मों एवं सम्प्रदायों का जन्म हुआ। जैसे - वैष्णव, जैन, कौल, पाँचरात्र, शैव, कापालिक, शक्ति, सिद्ध व नाथ आदि। साहित्य में भी परस्पर विरोधी तत्व दिखाई देते हैं। या देखने को मिलते हैं। 
आचार्य हजारी प्रसाद जी ने हिंदी साहित्य का आदिकाल (उनकी रचना का नाम) में अक्षरशः सत्य ही लिखा है - " शायद ही भारतवर्ष के साहित्य के इतिहास में इतने विरोधी और सव्तोव्याघातों का युग कभी आया होगा। इस काल में तो एक तरफ संस्कृत के ऐसे बड़े-बड़े कवि उत्पन्न हुए जिनकी रचनाये अलंकृत काव्य परम्परा की चरम-सीमा पर पहुंच गई थी और दूसरी ओर अपभ्रंश के कवि जो अत्यंत सहज, सरल भाषा में अत्यंत संक्षिप्त शब्दों में अपने मन के मनोभाव को प्रकट किया करते थे। फिर भी धर्म एवं दर्शन के क्षेत्र में भी महान प्रतिभाशाली आचार्यों का उद्भव इसी काल में हुआ था और दूसरी और निरक्षर संतों के ज्ञान-प्रचार का बीज भी इसी काल में बोया गया। संक्षेप में यहां इतना जान लेना पर्याप्त है की यह काल भारतीय विचारकों के मंथन का काल है , इसलिये अत्यंत महत्वपूर्ण है।  "

2. प्रारम्भिक काल का नामकरण -

आदिकाल के नामकरण को लेकर विद्वानों में मत एक समान नहीं है। इस काल को लेकर विभिन्न नाम उपलब्ध हैं हिंदी साहित्य के इतिहास में डॉ. गियर्सन ने इसे ' चारण काल ' कहा है। मिश्र  बंधुओ ने ' प्रारम्भिक काल ' , राहुल सांकृत्यायन ने ' सिद्ध सामंत युग ', आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने ' आदिकाल ', डॉ. रामकुमार वर्मा ' संधिकाल एवं चारणकाल ', विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने ' वीरकाल ' तथा डॉ. गणपति चंद्र गुप्त ने ' प्रारम्भिक काल ', ' अविभक्तिकाल ' की सर्वदा से विभूषित किया। कुछ अन्य विद्वानों ने इसे ' उत्तर-अपभ्रंश काल ', ' जैन काल ' आदि नामों से भी पुकारा गया है इस काल को। 
यद्धपि विद्वानों ने इस काल को अनेक नामों से पुकारा परन्तु इनमें कोई भी ऐसा नहीं जो युग का वास्तविक प्रतिनिधित्व कर सके। इस युग का नामकरण प्रवृत्ति विशेष के आधार पर न करके इस प्रकार किया जाना चाहिए की वह समग्र युग को अपने में समेत सके।  इन नामों में प्रारम्भिक काल अथवा आदिकाल नाम उपर्युक्त प्रतीत होता है।

किसने क्या कहा आदिकाल के नाम के विषय में

डॉ. गियर्सन   - चारण काल
मिश्र  बंधुओ ने   -    प्रारम्भिक काल
राहुल सांकृत्यायन ने     -  सिद्ध सामंत युग
आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी   -   आदिकाल
डॉ. रामकुमार वर्मा   -   संधिकाल एवं चारणकाल
 विश्वनाथ प्रसाद मिश्र  - वीरकाल
डॉ. गणपति चंद्र गुप्त   -    प्रारम्भिक काल
अविभक्तिकाल  - सर्वदा विभूषित

3. वीरगाथा काल नामकरण एवं वीरगाथा साहित्य आदिकाल में अधिकांशतः

वीरगाथा साहित्य की रचना हुई अथवा लिखा गया इसलिए इस रोशन आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे वीरगाथा काल नाम दिया डॉ शिवकुमार शर्मा ने हिंदी साहित्य युग और प्रवृत्तियों में लिखा है शुक्ला जी के नामकरण के संबंध में तीन प्रमुख बातों का ध्यान देना आवश्यक होगा पहले इसी काल में वीर का खात्मा ग्रंथों की प्रचुरता दूसरी जनों द्वारा प्राचीन ग्रंथों को धार्मिक साहित्य घोषित करके उसे रचनात्मक साहित्य की परिधि से निकाल देना और इस प्रकार ग्रंथों और सिद्धों की रचनाओं को शुद्ध साहित्य में स्थान देना तीसरी बात उन रचनाओं की है जिनमें भिन्न-भिन्न विषयों पर फुटकर दोहे मिलते हैं किंतु उनके किसी विशेष प्रवृत्ति का काव्य निर्मित ना हो सकता है नहीं बन सकता है।
आचार्य शुक्ल ने कुल 12 पुस्तकों के आधार पर कालका वीरगाथा काल नामकरण किया है और इन 12 पुस्तकों में चार उन्होंने अपभ्रंश भाषा की तथा आठ देसी भाषा के काव्य माने हैं जो निम्न प्रकार हैं

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