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लखन लाल गुप्त : छत्तीसगढ़ी साहित्य

1. श्री लखन लाल गुप्त का संक्षिप्त जीवन परिचय देते हुए उनकी रचनाओं पर प्रकाश डालिए। 

(अथवा) 

लखन लाल गुप्ता के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालिए। 

(अथवा)

छत्तीसगढ़ी निबंध के विकास में लखन लाल गुप्त का स्थान व्यक्त कीजिए।

उत्तर - साहित्यिक परिचय - छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास में लखन लाल गुप्त का अहम स्थान है। उनका जन्म 1 जुलाई 1933 को बिलासपुर में हुआ। उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा वाराणसी में रहकर पास की थी। 

एम.कॉम. और एल.एल.बी. की पढ़ाई की परीक्षाएं उन्होंने पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर से पास की। लखन लाल गुप्त की प्रतिभा बहुआयामी है। 

छत्तीसगढ़ी में उन्होंने कहानी, नाटक, कविता, निबंध आदि सभी विधाओं पर अपनी लेखनी को गति दी। उन्होंने उपन्यास भी लिखे हैं उनके 'चंदा अमृत बरसाइस' उपन्यास (1965) को छत्तीसगढ़ी की द्वितीय उपन्यास होने का गौरव प्राप्त है। 

इस उपन्यास के संबंध में मुकुटधर पांडे का मत है 'चंदा अमृत बरसाइस' यथा नाम तथा गुण है। पद पद पर अमृत टपकता है। कथानक सरल और सहज है। आंचलिक जन जीवन का चित्रण स्वभाविक बन पड़ा है।

लखन लाल गुप्त : छत्तीसगढ़ी साहित्य
Image by Khilawan


 रचनाएं

 लखन लाल गुप्त की प्रकाशित पुस्तकें -

काव्य - सैनिक गान, सत्यमेव जयते, पदमप्रभा, संझौती के बेरा।

उपन्यास - चंदा अमृत बरसाइस।

कहानी/एकांकी संग्रह - सरग ले डोला आइस।

आत्मकथा - सुरता के सोन किरन।

बाल साहित्य - हाथी घोड़ा पालकी, छत्तीसगढ़ी बाल नाट्य।

नाटक - जाग छत्तीसगढ़ जाग।

भाषा - आपकी भाषा में दो रूप मिलते हैं। प्रथम रूप में विचारात्मक निबंध आते हैं, जिनकी भाषा संयत एवं गंभीर है। द्वितीय रूप आलोचनात्मक निबंधों में पाया जाता है। इनकी भाषा प्रौढ़ है। इसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है। इसी से यह भाषा संस्कृत गर्भित और प्रांजल है।

इसके अतिरिक्त  आपकी भाषा में  चपलता, प्रवाह, व्यंग्य, वक्रता  और कहावतों के दर्शन होते हैं तथा व्यवहारिक और सीधी-सादी उनकी भाषा है। वे मुख्यतः वक्ता और अध्यापक हैं। अध्यापकीय सरलता उनकी भाषा में सदैव रहती है। उनकी भाषा में शिथिलता, अव्यवस्था नाम मात्र को भी प्राप्त नहीं होती है। इसके साथ ही आपकी भाषा प्रवाहपूर्ण सारगर्भित और अलंकृत भी है।

शैली - के संबंध में नहीं कहा जा सकता है कि वह विविध रूपों वाली है। कहीं व्यवहारिक कहीं मुहावरेदार, कहीं अलंकारिक तथा कहीं प्रौढ़ और कहीं लंबे-लंबे वाक्य और कहीं छोटे-छोटे वाक्य आपकी शैली की विशेषताएं हैं। आपकी शैली को निम्नलिखित रुप में विभाजित किया जा सकता है -

★Read : मुहावरे और लोकोक्तियों का अर्थ - हिंदी व्याकरण

विचारात्मक शैली, 

विवेचनात्मक शैली, 

आलोचनात्मक शैली,

व्याख्यात्मक शैली, 

व्यंग्यात्मक शैली,

आत्मा व्यंजक शैली, 

भावात्मक शैली।

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