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लक्ष्मण मस्तूरिया : छत्तीसगढ़ी साहित्य

1. लक्ष्मण मस्तूरिया पर टिप्पणी

लक्ष्मण मस्तूरिया

छत्तीसगढ़ में लक्ष्मण मस्तूरिया छत्तीसगढ़ी गीत के लिए प्रसिद्ध है। बिलासपुर जिले के मस्तूरी गांव में लक्ष्मण जी का जन्म हुआ था। मिट्टी के प्रति उनका प्यार उनके नाम से पता चलता है मस्तूरी को साथ लेकर चले हैं लक्ष्मण मस्तूरिया।  

जिंदगी में बहुत कष्ट उन्होंने झेलें हैं। इसलिए शायद उनके गीतों में इतनी ताकत है। रायपुर में राजकुमार कॉलेज के अध्यापक रहें हैं 1988 से। उन्हें छत्तीसगढ़ी लोक भाषण की उपाधि से भी सम्मानित किया गया है। 

उनकी प्रकाशित कृतियां हैं - 'हमू बेटा भूमिया के गंवई-गंगा, 'धुनरी बंसुरिया' 'माटी कहे कुम्हार से' (छत्तीसगढ़ी निबंध) | मस्तुरिया के गीत गोंदा में बहुत ही सुंदर है। उनका रिकॉर्ड भी म्यूजिक इंडिया ग्रामोफोन कंपनी ने निकाला है। उनका गीत 'मोर संग चलव रे' में छत्तीसगढ़िया अंतरे बहुत ही लोकप्रिय हैं। लक्ष्मण मस्तुरिया का सफर 3/11/2018 को हार्ट टैक की वजह से थम गया। 

लक्ष्मण मस्तूरिया : छत्तीसगढ़ी साहित्य
Image by Khilawan


लक्ष्मण मस्तुरिया के गीत-मोर संग चलवरे 

ओ गिरे थके हपटे मन 

अऊ परे डरे मनखे मन 

मोर संग चलव रे 

अमरैया कस जुड छांव मै 

मोर संग बईठ जुडालव 

पानी पिलव मै सागर अव 

दुःख पीरा बिसरालव 

नवा जोत लव, नव गाँव बर 

रस्ता नवा गढव रे। 

मोर संग चलव रे 

मै लहरी अव, मोर लहर मा 

फरव फूलो हरियावअ 

महानदी मै अरपा पैरी, 

तन मन धो हरियालव 

कहाँ जाहु बड दूर हे गँगा 

मोर संग चलव रे 

दीपक संग जूझे बर भाई मै बाना बांधे हव 

सरग ला पृथ्वी मा ला देहूं 

प्रण अइसन ठाने हव 

मोर सिमट के सरग निसइनी 

जुर मिल सबव चढ़व रे 

मोर संग चलव रे। 

लखन लाल गुप्त को साहित्य रचना करने में पंडित द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र से प्रेरणा मिली थी। उनकी कृतियों में चंदा अमृत बरसाइस, सरग सरग ले डोला, अहस, 'सुरता के सोन किरन' बहुत जाने-माने हैं। उन्हें भी कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है जैसे महावरी अग्रवाल पुरस्कार। उनकी पहली छत्तीसगढ़ी कविता 'भगवान जमो ला गड़थे' 1960 में बिलासपुर की सप्ताहिक पत्रिका में छापा गया था।' लखन लाल गुप्ता कहते हैं कि जिस समय उन्होंने लिखना शुरू किया उस समय छत्तीसगढ़ी साहित्यकारों का सम्मान उतना नहीं किया जाता था। बिलासपुर में पंडित द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र, रायपुर में हरि ठाकुर, दुर्ग में कोदूराम दलित, रायगढ़ में लाला फूलचंद श्रीवास्तव, धमतरी में नारायण लाल परमार, भगवती सेन जैसे साहित्यकार साहित्य सृजन में लगे हुए थे और इसी से साहित्यकारों को हिम्मत और प्रेरणा मिलती थी।

उनका कहना सही है कि छत्तीसगढ़ी एक भाषा है हिंदी का विकृत स्वरूप नहीं। वे कहते हैं - भाषा विज्ञान के अनुसार भाषा के 6 मूल तत्व होथे - सर्वनाम, कारक रचना, क्रियापद, शब्द भंडार, साहित्य अउ उच्चारण विधि, छत्तीसगढ़ी भाषा म ये जम्मो मूल तत्व विराजमान हवय। श्री हीरालाल काव्योपाध्याय के "छत्तीसगढ़ी व्याकरण छत्तीसगढ़ी ला पोठ करे खातिर महत्वपूर्ण किताब हवय। छत्तीसगढ़ी भाषा होय के सबले बड़े प्रमाण येला दू करोड़ लोगन बोल्थे।"

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