हिन्दी साहित्य के इतिहास दर्शन और साहित्येतिहास पर प्रकाश डालिए।

एम. ए. हिंदी 

(प्रथम सेमेस्टर)

आदिकाल एवं पूर्व मध्यकाल 

(प्रथम प्रश्न-पत्र)

 इकाई-1. आदिकाल-इतिहास दर्शन और साहित्येतिहास दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

 प्रश्न 5. हिन्दी साहित्य के इतिहास दर्शन और साहित्येतिहास पर प्रकाश डालिए।

उत्तर- 

Table of Content

  1. इतिहास का अर्थ एवं स्वरूप
  2. 'इतिहास दर्शन' की रूपरेखा
  3. हिन्दी साहित्य का इतिहास दर्शन

    (1) इतिहास का अर्थ एवं स्वरूप - भारत में इतिहास लेखन का प्रायः अभाव रहा है। पार्टिजर, अलबरूनी आदि। ने भारत में इतिहास के कालक्रम की उपेक्षा का संकेत दिया है। यही बात साहित्य के इतिहास के सम्बन्ध में लागू होती है। कई विद्वानों ने साहित्येतिहास के अभाव की शिकायत की है। मैकडानल ने लिखा है - "इतिहास भारत का कमजोर पक्ष है, इतना कि वह यहाँ लगभग अनुपस्थित है। इतिहास चेतना के सर्वथा अभाव के कारण ही संस्कृत साहित्य की पूरी सरणि ही अंधेरे में घिरी हुई है।" यह सच है कि भारत की अध्यात्मवादी और शाश्वतावादी अवधारणा के कारण व्यक्ति, घटना या कालक्रम को प्रायः महत्व नहीं दिया गया। अति प्राचीन ग्रंथों में तो रचयिताओं के नाम तक नहीं हैं।

'ऐसे ही था' या 'ऐसे ही हुआ' के अर्थ में इतिहास शब्द का प्रयोग किया जाता है। इससे स्पष्ट है कि इतिहास का सम्बन्ध भूत एवं यथार्थ से है। साहित्य का इतिहास ग्रंथों और ग्रंथकारों के उद्भव और विलय की कहानी ही नहीं है। वह कालस्रोत में बहे आते हुए जीवन्त समाज की विकास गाथा है। ग्रंथकार और ग्रंथ उस प्राणधारा की ओर इशारा मात्र करते हैं। वे ही मुख्य नहीं हैं, मुख्य हैं वह प्राणधारा जो नाना परिस्थितियों से गुजरती हुई आज हमारे भीतर अपने आपको प्रकाशित कर रही है। साहित्य के इतिहास में हम अपने आपको ही पढ़ने का सूत्र पाते हैं। जो प्राणधारा नाना देशकाल की विभिन्न परिस्थितियों से गुजरती हुई हमारे भीतर तक पहुँची है, वही किसी भी इतिहास का मुख्य लक्ष्य है।

    आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की परिभाषा इतिहास के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण है-, "जब प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्रवृत्ति का संचित प्रतिविम्ब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्रवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अन्त तक इन्हीं चित्रवृत्तियों की परम्परा को परखते हुए साहित्य परम्परा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही साहित्य का इतिहास कहलाता है।"

    अब प्रश्न उपस्थित होता है कि इतिहास लेखन एक कला है अथवा विज्ञान। आत्मपरक दृष्टिकोण वैयक्तिक अनुभूति एवं ललित शैली में लिखा गया इतिहास 'कला' हो सकता है, किन्तु साक्ष्यों तथ्यों, परिस्थितियों का तर्कपूर्ण, सूक्ष्मता से अध्ययन इतिहास को 'विज्ञान' की श्रेणी में स्थापित करता है।

(2) 'इतिहास दर्शन' की रूपरेखा - इतिहास का अध्ययन विविध रूपों, पद्धतियों से किया जाता रहा है, इन्हीं प्रयुक्त व प्रचलित दृष्टिकोणों, धारणाओं, विचारों एवं पद्धतियों को 'इतिहास दर्शन' की संज्ञा प्रदान की जाती रही है। 'इतिहास 'दर्शन' शब्द का सर्वप्रथम उपयोग वॉल्टेअर ने 'आलोचनात्मक या वैज्ञानिक इतिहास' के अर्थ में किया। हीगल ने 'विश्व इतिहास', परवर्ती विद्वानों ने 'परीक्षात्मक यथार्थवादी दृष्टिकोण' के अर्थ में प्रयोग किया। आधुनिक समय में 'इतिहास दर्शन' का प्रयोग पूर्व से पश्चिम, आदि से अंत तक के सभी विचारों एवं दृष्टिकोणों के प्रतिपादन के लिए किया जाता है। वस्तुतः 'इतिहास दर्शन' उन दृष्टिकोणों, विचारों व अध्ययन पद्धतियों के समूह का सूचक है जिनका प्रयोग इतिहास के अध्ययन में सम्भव है।

    (3) हिन्दी साहित्य का इतिहास दर्शन - संसार की सभी चीजों का अपना इतिहास है। साहित्य का भी एक निश्चित एवं लिखित इतिहास है। साहित्य के इतिहास में साहित्यिक रचनाओं का अध्ययन ऐतिहासिक कालक्रम की दृष्टि से करते हैं। इतिहास लेखन जब प्रारम्भ हुआ तो उसमें रचनाओं एवं रचनाकारों का स्थूल परिचय मात्र दिया जाता था। किन्तु ज्यों-ज्यों ऐतिहासिक दृष्टिकोण विकसित होता गया, इसमें सूक्ष्मता एवं गम्भीरता आती गई।

    अंग्रेजी विद्वानों का मानना है कि 'साहित्य समाज का ही प्रतिबिम्ब होता है।' प्रसिद्ध फ्रेंच विद्वान् 'तेन' ने भी माना है कि साहित्य की विभिन्न प्रवृत्तियों के मूल में तीन तत्व सक्रिय होते हैं- (1) जाति, (2) वातावरण, (3) क्षण विशेष । 

    हडसन का मानना है कि उपर्युक्त तीन तत्वों के अतिरिक्त रचनाकार का व्यक्तित्व एवं प्रतिभा भी महत्वपूर्ण होती है।

    जर्मन चिन्तकों ने भी 'साहित्येतिहास' के सम्बन्ध में 'युग चेतना' के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। इस सिद्धान्त के अनुसार इतिहास की व्याख्या तद्युगीन चेतना के आधार पर की जानी चाहिए। भारत में अधिकांश साहित्य का अध्ययन इस आधार पर किया भी जाता रहा है। वीरगाथात्मक काव्य, भक्तिकाल, रीतिकाल, राष्ट्रीय चेतनापूरक काव्य, छायावादी काव्य जैसे अनेक उदाहरण हैं जिनके आधार पर सिद्ध किया जा सकता है और चेतना का प्रभाव साहित्येतिहास पर निश्चित रूप से पड़ता है।

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