सन्त काव्य एवं सूफी काव्य में समानताएँ एवं असमानताएँ स्पष्ट करें।

1. सन्त काव्य एवं सूफी काव्य में समानताएँ एवं असमानताएँ स्पष्ट करें। 

मिलते जुलते प्रश्न 

1.1 संत काव्य और सूफी काव्य की तुलना कीजिए

1.2 संत और सूफी काव्य की तुलना कीजिए

उत्तर - 

संत काव्य एवं सूफी-काव्य का साम्य-वैषम्य

हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल की निर्गुण काव्य-धारा के अन्तर्गत संत काव्य एवं सूफी काव्य हैं। संत कवियों की पृष्टभूमि जहाँ पूर्णतः भारतीय हैं, वहीं सूफी कवि विदेशी जाति, विदेशी धर्म एवं मत से अनुप्राणित हैं। संत मत के सभी उपकरण, विचार, दर्शन एवं सिद्धान्त भारतीय हैं, तो सूफी मत ईरान और अरब में विकसित होने के कारण वहाँ के संस्कारों, विचारों एवं तत्वों को लेकर आया, किन्तु यहाँ आकर भारतीय धर्म एवं संस्कृति से भी इसने कई तत्व ग्रहण किये। इन दोनों ही काव्य-धाराओं का उद्देश्य हिन्दू-मुसलमानों में एकता स्थापित करना था। संत कवियों ने इस एकता की स्थापना धार्मिक धरातल पर की जबकि सूफी कवियों ने सांस्कृतिक धरातल पर। यद्यपि संत और सूफी मतों में कोई अन्य-जनक जैसा सम्बन्ध नहीं है तथापि दोनों ही निर्गुण काव्यधारा की दो शाखाएँ है, अतः उनमें हमें कई समानताएँ एवं विषमताएँ दिखाई पड़ती हैं। यहाँ हमारा प्रमुख लक्ष्य सन्त एवं सूफी काव्य के साम्य-वैषम्य पर प्रकाश डालना है, जिसे निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत विवेचित किया जा सकता है- 

  • समानताएँ
  • विशेषताएँ

समानताएँ - संत-काव्य एवं सूफी-काव्य में प्रमुख समानताएँ इस प्रकार है -

  1. गुरु की महत्ता
  2. प्रेम तत्व का निरूपण
  3. निर्गुण ईश्वर की परिकल्पना
  4. रहस्यवाद की प्रवृत्ति
  5. विरह-निरूपण
  6. उदारता एवं सहिष्णुता


(1) गुरु की महत्ता – दोनों काव्यधाराओं में गुरु को विशेष महत्व दिया गया है। प्रमुख संत कवि कबीरदास ने सद्गुरु को ईश्वर से भी बढ़कर माना है, क्योंकि ईश्वर की पहचान कराने वाला तो गुरु ही है -

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागू पाँय। 
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय।।


गुरु ही पग-पग पर मार्गदर्शन करता है और सभी शंकाओं का समाधान कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है, भ्रमजाल को काटता है और अज्ञान को जड़-मूल से नष्ट करता है। गुरु ही ईश्वर का सगा-सम्बन्धी है। अतः उसी से लौ लगानी चाहिए। संत रज्जब कहते हैं -

भरम जाल भव काटिया, शंका सब तोड़ी। 
साँचा सगा जे राम का, ल्यौ तासू जोड़ी।

सूफी कवियों ने भी गुरु को अपनी साधना-पद्धति में विशेष स्थान दिया है। उनकी स्पष्ट धारणा है कि गुरु ही मुक्ति का साधन है। बिना गुरु के ज्ञान नहीं होता और बिना ज्ञान के मुक्ति प्राप्त नहीं होती। जायसी की स्पष्ट धारणा है।

गुरु सुआ मोहि पंथ दिखावा। बिनु गुरु जगत को निरगुन पावा।

सूफी कवियों का विश्वास है कि गुरु कृपा से ही माया तथा शैतान के व्यवधान नष्ट किये जा सकते हैं।

(2) प्रेम तत्व का निरूपण - दोनों काव्य-धाराओं में प्रेम के महत्व को निर्विवाद रूप से स्वीकार किया गया है। सूफी कवियों ने 'प्रेम' को ही जीवन का मूल आधार बताया है, साथ ही उनकी यह भी धारणा रही है कि लौकिक प्रेम के माध्यम से अलौकिक प्रेम को प्राप्त किया जा सकता है। इन कवियों ने प्रेमगाथाओं के माध्यम से अलौकिक प्रेम की व्यंजना की ओर प्रेम के सार्वभौमिक स्वरूप की स्थापना की। कबीर यद्यपि ज्ञानमार्गी है किन्तु प्रेम की महत्ता का प्रतिपादन उनके काव्य में स्थान-स्थान पर देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए निम्न साखी को लिया जा सकता है---

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय। 
ढाई आखर प्रेम का पढै सौ पंडित होय।।

परमात्मा रूपी प्रियतम के वियोग में आत्मा की तड़प का वर्णन कबीर और जायसी दोनों ने किया है। इस प्रकार ही कवियों ने प्रेम की पीड़ा का वर्णन करते हुए ईश्वर प्राप्ति में इसे प्रमुखता प्रदान की है। 

(3) निर्गुण ईश्वर की परिकल्पना - संत कवियों ने ईश्वर को निर्गुण, निराकार, अजन्मा एवं सर्वव्यापी माना है। इसी प्रकार आदि सूफी कवियों ने ईश्वर को निर्गुण, निराकार एवं संसार का संचालन करने वाला तत्व स्वीकार किया है। कबीर ने स्पष्ट रूप से यह घोषणा की कि ईश्वर मंदिर, मस्जिद में नहीं रहता, अपितु घट-घट में व्याप्त है, अतः उसे अपने मन में ही खोजना चाहिए। जायसी ने भी उस परमात्मा को प्रेम के द्वारा प्राप्त करने की बात कही है। उसे प्राप्त करने का अधिकार सभी लोगों को है। जायसी ने तो यहाँ तक कह दिया है -

विधना के मारग हैं ते ते। 
सरग नखत तन रोवा जेते।।

    धार्मिक दृष्टि से सूफियों की यह उदारता इस्लाम धर्म में दिखायी नहीं देती। ईश्वर को प्राप्त करने की अनेक विधियाँ हैं, अनेक मार्ग हैं, इस प्रकार की उदारवादी अपेक्षा सूफी कवियों से ही की जा सकती है। इसी प्रकार संतों ने घोषणा की कि जाति-पांति के संकीर्ण बंधनों से ऊपर उठकर जो सच्चे मन से ईश्वर की आराधना करता है, उसे ईश्वर की प्राप्ति अवश्यमेव होती है -

जाति पांति पूछै नहि कोई। 
हरि को भजे सो हरि का होई।।

(4) रहस्यवाद की प्रवृत्ति – दोनों काव्य-धाराओं में रहस्यवाद की प्रवृत्ति भी परिलक्षित होती है। कबीर के काव्य में रहस्यवाद या तो उन पदों में है जो योग साधना से सम्बन्धित है और जिनमें कुंडलिनी षटचक्रों का भेदन करती हुई सहस्रार में पहुँचकर अमृत-रस का पान करती है। ऐसे स्थलों पर साधनात्मक रहस्यवाद है, जबकि उन स्थलों पर जहाँ आत्मा एक प्रेयसी के रूप में परमात्मा-रूपी प्रियतम से मिलने के लिए व्याकुल है अथवा उससे मिलकर आनन्द की अनुभूति करती है, वहाँ भावात्मक रहस्यवाद है। इस प्रकार कबीर के काव्य में साधनात्मक एवं भावात्मक दोनों कोटियों का रहस्यवाद उपलब्ध हो जाता है।

    सूफी कवि जायसी के काव्य में भी यद्यपि दोनों ही प्रकार का रहस्यवाद-साधनात्मक एवं भावात्मक उपलब्ध हो जाता है, तथापि प्रधानता रहस्यवाद की ही है। जायसी ने जहाँ सिंहलगढ़ का वर्णन किया है और हठयोग की परिभाषित शब्दावली का प्रयोग किया है, यहाँ प्रथम कोटि का रहस्यवाद है और जहाँ रत्नसेन रूपी आत्मा पद्मावती-रूपी परमात्मा से मिलन के लिए व्याकुल है, वहाँ भावात्मक कोटि का रहस्यवाद मानना चाहिए। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इन दोनों के रहस्यवाद की तुलना करते हुए लिखा है - "यदि कहीं सच्चे भावात्मक रहस्यवाद के दर्शन होते हैं, तो जायसी आदि सूफी कवियों में सूफियो का रहस्यवाद शुद्ध भावात्मक कोटि में आता है जबकि संतों का रहस्यवाद साधनात्मक कोटि में, क्योंकि उसमें विविध यौगिक प्रक्रियाओं का उल्लेख है।"

(5) विरह-निरूपण - सूफी कवियों ने अपने प्रेमाख्यानों में विरह-निरूपण की प्रवृत्ति का परिचय दिया है। जायसी ने पद्मावत में एक ओर तो नागमती के विरह का मार्मिक निरूपण करते हुए वियोग शृंगार की योजना की है तो दूसरी ओर आत्मा (रत्नसेन) की व्याकुलता का चित्रण करते हुए अलौकिक सत्ता के प्रति विरह निवेदन करते हुए रहस्यवादी प्रवृत्ति का परिचय दिया है। निष्कर्ष यह है कि सूफी काव्य में लौकिक विरह का चित्रण भी है तथा अलौकिक विरह का भी दूसरी ओर संत काव्य में विरह-निरूपण का केवल वही रूप मिलता है जिसमें आत्मा एक विरहिणी के रूप में परमात्मा से मिलने के लिए व्याकुल है। विरह की यह तीव्रता कबीर की निम्न साखी में देखी जा सकती है -

कै विरहिन कूँ मीचु दै कै आपा दिखलाय। 
रात दिनाँ को दाझणा मोपै सहया न जाय।।

    विरह-वर्णन में संत कवि अलौकिकता की ओर अधिक झुके हुए हैं। 

(6) उदारता एवं सहिष्णुता - संत मत एवं सूफी मत दोनों में ही धार्मिक उदारता एवं सहिष्णुता परिलक्षित होती है। संत कवियों ने जहाँ ऐसे सामान्य धर्म का प्रतिपादन किया जो हिन्दू मुसलमानों को समान रूप से स्वीकार था, वही निर्गुणोपासना द्वारा एक ऐसे ईश्वर की स्थापना की जो हिन्दुओं की अद्वैतवादी विचारधारा से मेल खाता या तो मुसलमानों के एकेश्वस्थाद से। यही कारण था कि कबीर आदि संत कवियों को हिन्दू-मुसलमानों ने समान रूप से समादृत किया। उनकी विचारधारा संकीर्ण नहीं थी, वे किसी एक धर्म या सम्प्रदाय से जुड़े हुए नहीं थे।

    सूफीधर्म में भी इस्लाम की कट्टरता एवं साम्प्रदायिकता का अभाव है। वे प्रत्येक व्यक्ति को अपना धर्म मानने की, अपने विश्वास के अनुसार चलने की स्वतन्त्रता के पक्ष में है। सूफियों की इस धार्मिक उदारता के कारण उनके शिष्यों में हिन्दू-मुसलमान दोनों वर्गों के लोग रहे हैं। सूफी संत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह अजमेर शरीफ पर जितनी श्रद्धा मुसलमानों की है उतनी ही हिन्दुओं की भी। यह सूफी मत की उदारता का सबसे बड़ा प्रमाण है। जायसी आदि सूफी कवियों के काव्य में कहीं पर साम्प्रदायिक भाव नहीं है। जिस प्रकार संत कवियों ने आचरण की शुद्धता, कर्म की पवित्रता पर बल दिया, जाति-पाँति के बंधनों को अस्वीकार किया, उसी प्रकार सूफी कवियों ने भी सदाचरण, पवित्र कर्म एवं के सहिष्णुता को शुद्ध जीवन के लिए आवश्यक माना। 

विशेषताएँ - संत काव्य एवं सूफी काव्य भिन्न-भिन्न परिवेश एवं परिस्थितियों से उद्भूत हुए हैं अतः उनमें अनेक विषमताएँ भी हैं। संत मत भारतीय परिवेश एवं पृष्ठभूमि में विकसित हुआ जबकि सूफी धर्म विदेशी परिवेश एवं पृष्ठभूमि को लेकर भारत में आया, अतः उनमें मूलभूत तात्विक अन्तर मिलना स्वाभाविक है। यहाँ हम दोनों काव्य-धाराओं में उपलब्ध वैषम्य को निम्न शीर्षकों में विवेचित कर सकते हैं---

  1. प्रणय भावना में अंतर 
  2. हिन्दू-मुस्लिम एकता 
  3. काव्य रूप में अंतर् 
  4. वैचारिक एवं सैद्धांतिक विषमता 
  5. नारी-विषयक दृष्टिकोण 
  6. सिद्धों और नाथों का प्रभाव 
  7. भाषागत अंतर

(1) प्रणय भावना में अन्तर -- संत कवियों ने अपने काव्य में जिस प्रेम का निरूपण किया है, वह लौकिक न होकर अलौकिक है। कबीर ने आत्मा-परमात्मा के प्रेम का चित्रण अपने काव्य में किया है, जिसके लिए वे दाम्पत्य प्रेम के प्रतीक को ग्रहण करने में संकोच नहीं करते, किन्तु उसमें सर्वत्र आध्यात्मिकता का समावेश है, लौकिक प्रेम को वे त्याज्य एवं हेय दृष्टि से देखते हैं किन्तु सूफी कवियों ने लौकिक एवं अलौकिक दोनों प्रकार के प्रेम का चित्रण अपने काव्य-ग्रन्थों में किया है। सूफियों की प्रेम-गाथाओं का मूल आधार लौकिक प्रेम-कथाएँ ही हैं। उनकी यह मान्यता है कि लौकिक प्रेम ही अलौकिक प्रेम का साधन है, अतः उन्होंने लौकिक प्रेम के प्रति उपेक्षा भाव या हीन दृष्टि का परिचय नहीं दिया है।

    रत्नसेन का पद्मावती के प्रति प्रेम मूलतः तो लौकिक प्रेम ही है। इसी प्रकार नागमती की विकलता जो अपने पति रत्नसेन के प्रति है लौकिक प्रेम के अन्तर्गत ही आयेगी। संत काव्य में इस प्रकार की लौकिक प्रणयभावना का नितान्त अभाव है। 

    संत कवियों ने अलौकिक प्रेम का चित्रण करते समय आत्मा को स्त्री तथा परमात्मा को पुरुष के रूप में माना है किन्तु सूफी कवियों ने इस क्रम को परिवर्तित कर दिया है। वहाँ रत्नसेन (पुरुष) को आत्मा और पद्मावती (स्त्री) को परमात्मा मानकर विदेशी (ईरानी) प्रभाव की पुष्टि की गयी है।

(2) हिन्दू-मुस्लिम एकता – संत कवियों ने हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए जो प्रयास किए, वे धार्मिक स्तर के प्रयास थे। उन्होंने अपने उपदेशों द्वारा बार-बार इस मत का प्रतिपादन किया कि राम और रहीम, ईश्वर और ख़ुदा अलग-अलग नहीं हैं, अपितु एक ही शक्ति के दो अलग-अलग नाम हैं। उनकी स्पष्ट धारणा है कि मुल्ला-मौलवी तथा पंडित सामान्य लोगों को 'भ्रम' में डालकर भड़काते रहते हैं। कबीर स्पष्ट घोषणा करते हैं-

द्वै जगदीस कहाँ तै आया, 
कहु कौने भरमाया?

    कबीर ने अपने उद्देश्य की पूर्ति हिन्दू-मुस्लिम धार्मिक एकता द्वारा करने का प्रयास किया जबकि सूफी कवियों ने धर्म-जैसे नाजुक विषय को बिल्कुल नहीं हुआ। उन्होंने सांस्कृतिक स्तर पर एकता स्थापित करने का प्रयत्न किया। कबीर ने जहाँ दोनों सम्प्रदायों की धार्मिक, सामाजिक बुराइयों का निर्भीकता पूर्वक खण्डन किया, वहीं जायसी ने सार्वभौमिक प्रेम तत्व का आश्रय लेकर इन दोनों सम्प्रदायों के दिलों को जोड़ने का प्रयास किया। जायसी में खण्डन-मण्डन की वह प्रवृत्ति परिलक्षित नहीं होती जो कबीर के स्वभाव की प्रमुख विशेषता थी।

(3) काव्य रूप में अन्तर - सूफी काव्य एवं संत काव्य के काव्य-रूपों में भी अन्तर है। सूफी कवियों ने हिन्दू घरों में प्रचलित प्रेम कहानियों को आधार बनाकर प्रेम गाथाएँ लिखीं, जिनमें एक सानुबंध कथा है। इनके ग्रन्थ प्रबन्ध-काव्य हैं। जायसी का पद्मावत हिन्दी का एक उत्कृष्ट महाकाव्य माना जाता है जबकि संत कवियों की रचनाएँ प्रायः मुक्तक काव्य के अन्तर्गत हैं। कबीर आदि संत कवियों का उद्देश्य कविता करना नहीं था, अपितु अपने उपदेशों को जनता तक पहुँचाने के लिए उन्होंने उसे जैसे-तैसे काव्य निबद्ध कर दिया है। प्रबन्ध काव्य लिखने की योग्यता और क्षमता भी संत कवियों में नहीं थी। कबीर ने स्वयं यह बात कही है कि वे निरक्षर है - "मसि कागद छूऔ नहीं कलम गह्यो नहिं हाथ" संतों के अधिकांश-काव्य साखी, सबद, रमैनी, पद, कवित्त, छप्पय आदि के रूप में है जबकि सूफी कवियों ने प्रबन्ध काव्य में उपयुक्त दोहा-चौपाई शैली को अपनाया है। सूफी कवियों ने प्रबन्ध काव्यों की रचना करते हुए उनका समावेश अपनी रचनाओं में कर दिया है जो प्रबन्ध रचना के लिए आवश्यक बताये गए हैं। वस्तु वर्णन, प्रकृति चित्रण, कथानक, रूढ़ियाँ, चरित्रांकन, कथा संगठन आदि दृष्टियों से पद्मावत एक सफल महाकाव्य है।

(4) वैचारिक एवं सैद्धान्तिक विषमता - संत मत एवं सूफी मत में वैचारिक एवं सैद्धान्तिक मतभेद स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ते हैं। जायसी आदि सूफी कवियों ने जहाँ साधना के चार पड़ावों-शरीअत तरीकत, हकीकत, मारिफत का उल्लेख अपनी रचनाओं में किया है, वहाँ कबीर आदि संत कवियों में इनका कोई उल्लेख नहीं है। जायसी ने पद्मावत में इन चार पड़ावों की ओर संकेत करते हुए इन्हें मुक्ति के लिए आवश्यक माना है - 

चारि बसेरे सौ चढ़ै सत सौं उतरै पार।

    सूफी कवि ईश्वर को प्रकृति में व्याप्त मानते हैं, इसलिए इस संसार को सुन्दर, आकर्षक मानते हैं जबकि संत कवियों ने इस संसार को नाशवान्, मिथ्या मानकर अद्वैत-वेदान्तियों के 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या' का समर्थन किया है -

यह ऐसा संसार है जैसा सैंवल फूल। 
दिन दस के व्यौहार कौं झूठे रंग न भूलि।।

    संत काव्यों ने 'माया' के अस्तित्व को स्वीकार किया है और उसे जीव एवं ब्रह्म के बीच में बाधक मानकर उससे सावधान रहने का उपदेश दिया है, वहीं सूफी साधना में शैतान की सत्ता स्वीकार की गई है। उनका मत है कि शैतान के आने से साधना में परिपक्वता आती है। सूफी मत में 'पीर' की बड़ी मान्यता है, वही साधक को शैतान के शिकंजे से मुक्त करता है। जायसी के पद्मावत में उनकी इन मान्यताओं को देखा जा सकता है। 

(5) नारी-विषयक दृष्टिकोण - इन दोनों काव्य-धाराओं के कवियों ने नारी के सम्बन्ध में जो विचार व्यक्त किए हैं, वे भी परस्पर साम्य नहीं रखते। कबीर आदि संत कवियों ने नारी को नरक का द्वार कहते हुए उसे साधना में बाधक माना है। संत कवियों ने जी खोलकर नारी निंदा की है किन्तु सूफी कवियों में यह नारी विरोधी स्वर सुनाई नहीं पड़ता। पद्मावत जैसे महाकाव्यों में नारी सौन्दर्य का अद्वितीय वर्णन नखशिख खण्ड के अन्तर्गत किया गया है। यही नहीं उन्होंने पद्मावती को ब्रह्म का प्रतीक माना है। नागमती के रूप में भी एक आदर्श भारतीय रमणी का चरित्र प्रस्तुत किया गया है। निष्कर्ष यह कि नारी के प्रति संत कवियों का दृष्टिकोण जहाँ असन्तुलित एवं पूर्वाग्रह से युक्त है, वहीं सूफियों ने नारी के प्रति सम्मानीय दृष्टि रखते हुए उनकी उपयोगी भूमिका पर प्रकाश डाला है। इस प्रकार यह कहना उपयुक्त होगा कि दोनों काव्य-धाराओं के नारी विषयक दृष्टिकोण में पर्याप्त अन्तर है।

(6) सिद्धों और नाथों का प्रभाव - संत कवियों पर सिद्धों और नाथों का प्रभाव दिखाई पड़ता है। संतों की रहस्य भावना, ईश्वर के निराकार रूप की परिकल्पना, योग की परिभाषित शब्दावली तथा समाज सुधार की खण्डनात्मक पद्धति आदि पर सिद्धों एवं नाथपंथियों का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष प्रभाव परिलक्षित होता है। सिद्धों की भाँति कबीर भी अटपटे रूपकों एवं उलटवासियों के द्वारा चमत्कृत करने का प्रयास करते दिखाई पड़ते हैं। सूफी कवियों पर सिद्धों एवं नाथों का कोई प्रभाव परिलक्षित नहीं होता। योग आदि की जो शब्दावली सूफी काव्यों में दिखाई पड़ती है, वह अन्य विषयों की भाँति उन्होंने हिन्दू धर्म एवं संस्कृत से यात्किंचित ग्रहण कर ली है। पुराण, आयुर्वेद, ज्योतिष आदि की जो थोड़ी-बहुत जानकारी जायसी ने हिन्दुओं से ली थी उसका उपयोग उन्होंने अपने पद्मावत में स्थान-स्थान पर किया है, किन्तु नाथों एवं सिद्धों से उनकी विचारधारा कहीं भी प्रभावित दिखाई नहीं पड़ती।

(7) भाषागत अन्तर - संत कवियों और सूफी कवियों की भाषा में भी अन्तर दिखाई पड़ता है। संत कवियों ने सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग किया है जिसमें पूर्वी हिन्दी राजस्थानी, पंजाबी, ब्रजभाषा का मेल है जबकि जायसी आदि सूफी कवियों की भाषा ठेठ ग्रामीण अवधी है। संतों की भाषा अव्यवस्थित है, उसमें व्याकरिणक दोष है तथा अटपटे शब्दों का प्रयोग किया गया है जबकि सूफी काव्य की भाषा में इस प्रकार के दोष नहीं हैं। कबीर ने प्रतीकात्मक शैली का प्रयोग करते हुए अनुभूति को अभिव्यक्त किया है जबकि जायसी ने प्रायः सामान्य भावों का ही प्रयोग किया है। कुछ स्थानों पर अवश्य ऐसे शब्दों का प्रयोग है, जहाँ दुहरे अर्थों की व्यंजना हुई है।

    इस विवेचन के आधार पर वह कहा जा सकता है कि भक्तिकाल की निर्गुण शाखा की इन दोनों काव्य-धाराओं में पर्याप्त साम्य-वैषम्य है। संत काव्य पूर्णतः भारतीय जीवन दृष्टि, संस्कृति, परिवेश एवं पृष्ठभूमि से अनुप्राणित है। अतः वह उस सूफी काव्य से पर्याप्त विषमता रखता है जिसका मूल स्रोत अरब और ईरान जैसे विदेशी राष्ट्र रहे हैं। संत कवि उपदेशक पहले हैं, कवि बाद में परन्तु सूफी कवि मूलतः कवि है, उपदेशक बाद में है। कबीर आदि अक्खड़ संत कवियों ने जहाँ जनता के एक बहुत बड़े वर्ग को अपनी ओर आकर्षित किया, वहीं जायसी आदि सूफी कवियों ने अपनी सहज उदारता, सहिष्णुता का परिचय देते हुए हिन्दू जनता को अपनी सरस लेखनी का प्रशंसक बना दिया। वस्तुतः दोनों ही काव्य-धाराओं का महत्व निर्विवाद रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए, क्योंकि इन दोनों काव्य-धाराओं ने हिन्दी साहित्य को अमूल्य ग्रन्थ रत्न दिए हैं और जनता के बहुत बड़े वर्ग ने उनकी सराहना की है।


हमारे सोशल मीडिया लिंक्स जिनका उपयोग करके आप सवाल पूछ सकते हैं। 

Related Posts

Post a Comment