Skip to main content

कम्प्यूटर की उपयोगिता।

 1. कम्प्यूटर की उपयोगिता। 

उत्तर - कम्प्यूटर की उपयोगिता - कम्प्यूटर अपने उतपत्ति के कुछ वर्षों के अंदर ही अपनी स्थिति इतनी मजबूत बना ली है कि मनुष्य को इसे लगभग हर क्षेत्र में उपयोग में लाने के विषय में सोचना ही पड़ता है। 

बालक से लेकर वृद्धों तक कम्प्यूटर की सेवा का विस्तार हो रहा है, कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कम्प्यूटर की उपयोगिता का अध्ययन निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है -

  1. शिक्षा के क्षेत्र में 
  2. कार्यालयीन कामकाज में 
  3. संचार के क्षेत्र में 
  4. वैज्ञानिक अध्ययन में 
  5. उद्योग जगत में 
1. शिक्षा के क्षेत्र में - आज कम्प्यूटर का उपयोग शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक रूप से हो रहा है इसने अपनी उपयोगिता को स्पष्ट किया है मेडिकल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में तो कम्प्यूटर शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग बन चूका है। 

2. कार्यालयीन कामकाज में - आज कम्प्यूटर के आ जाने कार्यालयीन कामकाज बहुत ही आसान हो गया है अब आवेदन पत्र लिखने की आवश्यकता नहीं होती। सीधे प्रिंट करके उसमें साइन करके दिया जा सकता है। 

3. संचार के क्षेत्र में - कम्प्यूटर आज मुख्य रूप से सुचना का माध्यम बना हुआ है कम्प्यूटर के माध्यम से एक खबर को दूसरे तक पहुंचाना होता है। 

4. वैज्ञानिक अध्ययन में - कम्प्यूटर का सबसे ज्यादा यूज विभिन्न प्रकार के शोधों में डाटा को एक वैज्ञानिक से दूसरे वैज्ञानिक तक पहुंचाया जा सकता है। 

5. उद्योग जगत में - हर किसी कारखाने की बात करें तो यह सभी जगह एक काम अवश्य करता है वो है हिसाब किताब का और डाटा को सेव करने के लिए रखा जाता हूँ। आदि। 

Computer ki upyogitaa

Comments

Popular posts from this blog

भ्रमरगीत सार : सूरदास पद क्रमांक 88 सप्रसंग व्याख्या By Khilawan

   भ्रमरगीत सार आचार्य रामचंद्र शुक्ल  अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने  भ्रमर गीत के पद क्रमांक 87 की व्याख्या  को अपने इस ब्लॉग  questionfieldhindi.blogspot.com  में पब्लिस किया था। आज हम  भ्रमर गीत पद क्रमांक 87 की सप्रसंग व्याख्या  के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं। भ्रमरगीत सार की व्याख्या     पद क्रमांक 88 व्याख्या  -  सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल bhrmar-geet-sar-surdas-ke-pad - 88 श्री कृष्ण का वचन उद्धव-प्रति 88. राग गौरी ऊधो ! क्यों राखौं ये नैन ?  सुमिरि सुमिरि गुन अधिक तपत हैं सुनत तिहारो बैन।। हैं जो मन हर बदनचंद के सादर कुमुद चकोर। परम-तृषारत सजल स्यामघन के जो चातक मोर। मधुप मराल चरनपंकज के, गति-बिसाल-जल मीन। चक्रबाक, मनिदुति दिनकर के मृग मुरली आधीन।। सकल लोक सूनी लागतु है बिन देखे वा रूप। सूरदास प्रभु नंदनंदन के नखसिख अंग अनूप।। शब्दार्थ  - राखौं = रोकूँ या समझाऊँ। तपत = तपते हैं - दुखी होते हैं। तिहारों बैन = तुम्हारी वाणी। मनहर = मन क...

भ्रमर-गीत-सार : सूरदास पद क्रमांक 1 की व्याख्या By Khilawan

Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने  भ्रमर गीत सार के पद क्रमांक 1 से लेकर पद क्रमांक 10 को प्रकाशित किया था अब हम उनकी व्याख्या  को अपने इस ब्लॉग questionfieldhindi.blogspot.com में पब्लिस कर रहे हैं। आज हम  भ्रमर गीत  पद क्रमांक 1 की सप्रसंग व्याख्या  के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं... भ्रमरगीत सार की व्याख्या भ्रमरगीतसार पद क्रमांक 1 व्याख्या आज के इस पोस्ट में हम बात करने वाले हैं भ्रमरगीत सार के पद क्रमांक 1 की  सप्रसंग व्याख्या को लेकर जिसमें हम विभिन्न कठिन शब्दों के अर्थ भी जानेंगे। सबसे पहले शब्दार्थ को  जानते हैं फिर बात करेंगे भ्रमरगीत के संदर्भ और प्रसंग तथा व्याख्या की। चलिए शुरू करते हैं..   पहिले करि परनाम नंद सो समाचार सब दीजो।  औ वहां वृषभानु गोप सो जाय सकल सुधि लीजो।।  श्रीदाम आदिक सब ग्वालन मेरे हुतो भेंटियो।  सुख-सन्देस सुनाय हमारी गोपिन को दुख मेटियो।।  मंत्री एक बन बसत हमारो ताहि मिले सचु पाइयो।  सावधान है ...

औचित्य सिद्धांत की स्थापनाओं का वर्णन कीजिए।

  प्रश्न 15. औचित्य सिद्धांत की स्थापनाओं का वर्णन कीजिए।  औचित्य सिद्धांत की स्थापनाएं उत्तर-औचित्य शब्द का अर्थ है - उचित का भाव। औचित्य सिद्धांत के संस्थापक आचार्य क्षेमेन्द्र हैं। उन्होंन औचित्य की जो परिभाषा प्रस्तुत की है, उसका अर्थ इस प्रकार है-"जो वस्तु अथवा तत्व किसी के निश्चय ही अनुरूप हो, उसे आचार्यों ने उचित कहा है। उचित का भाव ही औचित्य है।" औचित्य को काव्य का तत्व स्वीकार करते हुए कहा है - "औचित्य रससिद्ध काव्य का स्थिर जीवन है ।"       आचार्य क्षेमेन्द्र ने यह भी कहा है कि औचित्य के बिना अलंकार भी गुणयुक्त नहीं हो सकते । स्त्री पुरुष का उदाहरण देते हुए औचित्य की बात निम्न प्रकार कही है - कंठे मेखलया नितम्बफलके तारेण हारेण वा,  पाणौ नूपुर बन्धनेन चरणे केयूर पाशेन वा। शौर्येण प्रणते रिषौ करुणया नामान्ति के हास्यताम्।  (गले में करधनी, नितम्ब पर लम्बा हार, हाथ में नूपुर और चरणों में नूपुर बांधने से कौन-सी नारी तथा प्रणाम करने वाले के प्रति शूरता, शत्रु पर करुणा से कौन-सा पुरुष हंसी का पात्र नहीं बनता । औचित्य के बिना अल...