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छंद के प्रश्न उत्तर : छंद MCQ

 छंद के महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर 

प्रश्न 1. छंद किसे कहते हैं?

उत्तर - छंद वह साँचा है जिसके अनुसार कविता ढलती है। छंद वह पैमाना है जिससे कविता की लम्बाई नापी जाती है। मात्रा, वर्ण, यति, गति, लय,तुक से बंधी रचना छंद कहलाती है। 

प्रश्न 2. सवैया छंद किसे कहते हैं?

उत्तर - लक्षण इस प्रकार से होते हैं -

  1. सवैया एक वर्णिक छंद है। 
  2. इसके प्रत्येक चरण में 22 से लेकर 26 तक वर्ण होते हैं। 
  3. इस छंद के प्रकार हैं - मालती, किरीट, मत्तगयंद, मदिरा, दुर्मिल सवैया आदि। 
  4. यहाँ केवल मत्तगयंद सवैया का उदाहरण प्रस्तुत है। 
  5. मत्तगयंद सवैया के प्रत्येक चरण में भगण (S II) होते हैं। 
  6. इसके अंत में दो गुरु वर्ण होते हैं। 
  7. प्रत्येक चरण में 23 वर्ण होते हैं -

उदाहरण -

1. पग नूपुर भी पहुँची कर 

    S II II IS II SI IS

कजनि मंजु बनी मनि माल हिये। = 24 अक्षर। 

(मदिरा सवैया का उदा.)

सिंधु तरयो उनको बनरा तुम 

पै धनु रेख गई न तरी। 

2. तोरि सरासन शंकर को,

शुभ स्वयंबर माँझवरी। 

ताते बढ़यो अभिमान महा,

मन मेरी यों नेक न संक करी। 

सो अपराध परो हमसों 

अब क्यों मधुरै तुमहूँ धौ कहौं। 

बाहु दै दाउ कुठारहिं केशव,

आपने धाम को पंथ गहौ। 

सात भगण व् अंत में एक गुरु के 

संयोग से मदिरा सवैया बनता है। 

प्रश्न 3. छः चरण किस छंद में होते हैं? नाम लिखते हुए उदाहरण दीजिये। 

अथवा 

छप्पय छंद के लक्षण एवं उदाहरण बताइये। 

उत्तर - लक्षण इस प्रकार हैं -

  1. विषम मात्रिक छंद है। इसे संयुक्त छंद भी कहते हैं। 
  2. इसमें कुल छः चरण होते हैं। 
  3. प्रथम चरण रोला के तथा अंतिम दो चरण उल्लाला के होते हैं। 
  4. प्रथम चार चरण 24-24 मात्रा के होते हैं 11-13 पर यति होती है। 
  5. उल्लाला के प्रत्येक चरण में कुल 28 मात्राएँ होती हैं 15-13 मात्रा पर यति होती है,
  6. उल्लाला के प्रथम + तृतीय चरण में 15-15 मात्राओं के होते हैं। दूसरे और चौथे चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं। 
उदाहरण - 

1. मरै बैल गरियार, मरै वह अड़ियल टट्टू। 

मरै कर्कशा नारि, मरै वह खसम निखट्टू। 

ब्राम्हण सो मरि जाय, हाथ लै मदिरा प्यावै। 

पूत सोई मरि जाय जो कुल को दाग लगावै। 

अरु बेनियाव राजा मरे तबै नींद भरि सोइए। 

बैताल कहै विक्रम सुनौ, एतै मरै न रोइए।।

S III S I S S I S II S II S S I S

2. हे शरणदायिनी देवि तू, करती सबका त्राण है 

हे मतृभूमि! संतान हम, तू जननी तू प्राण है।। = 28 

उदाहरण - नीलांबर परिधान, हरित पट पर सुन्दर है, (छप्पय छंद का उदा.)

3. सूर्य चंद्र युग-मुकुट मेखला, रत्नाकर है। दो रोला 

नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं। 

बन्दी जन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है -

करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेश की,

हे मातृभूमि! तू सत्य ही सगुण मूर्ति सर्वेश की।।

(एक उल्लाला)

प्रश्न 4. कवित्त छंद के लक्षण उदाहरण सहित लिखिए।

लक्षण -

  1. कवित्त एक वर्णिक छंद है। 
  2. इसके प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते हैं। 
  3. 16 वें और 15 वें वर्ण पर विराम होता है। 
  4. प्रत्येक चरण का अंतिम वर्ण गुरु होता है। इसे मनहरण छंद भी कहते हैं। 
उदाहरण -

1. शिशिर में शशि कौ सरूप पावै सविताउ,

घाम हूँ में चाँदनी की दुति दमकति है। 

सेनापति होत शीतलता है सहसगुनी,

रजनी की झाई वासर में झलकति है। 

2. ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहनवारी 

ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहती है। 

कंदमूल भोग करै, कंदमूल भोग करै। 

तीन बेर खाती से, वे तीन बेर खाती है। 

प्रश्न 5. सवैया छंद को सोदाहरण समझाइए। 

उत्तर - 

सवैया छंद के लक्षण -

  1. सवैया एक वर्णिक छंद है। 
  2. इसके चार चरण होते हैं। 
  3. प्रत्येक चरण में 22 से लेकर 26 तक वर्ण होते हैं। 
  4. मालती, किरीट, मत्तगयंद मदिरा आदि इस छंद के प्रमुख भेद हैं। 
मत्तगयंद सवैये का यह मनोरम उदाहरण दर्शनीय है -

1. धूरि भरे अति शोभित श्यामजू,

तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी। 

खेलत खात फिरै अँगना,

पग पैंजनि बाजति पीत कछौटी। 

वा छबि को रसखान विलोकत,

वारत काम कला निधि कोटी। 

काग कौ भाग बड़े सजनी, 

हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी।।

प्रश्न 6. कुंडलियाँ छंद के लक्षण लिखिए तथा एक उदाहरण भी दीजिये। 

उत्तर - 

कुण्डलियाँ छंद परिभाषा - यह एक विषम मात्रिक छंद है, जिसमें 24-24 मात्राओं वाले छः चरण होते हैं। यह दोहा और रोला से मिलकर बना है। दोहा का अंतिम चरण रोला का प्रथम चरण होता है। 

कुण्डलियाँ छंद के लक्षण -

  1. यह विषम मात्रक छंद है। 
  2. इसके कुल छः चरण होते हैं। 
  3. इसके प्रत्येक चरण में 24-24 मात्राएँ होती हैं। 
  4. यह दोहा और रोला छंद के योग से बनता है। 
उदाहरण - 

1. "गुन के गाहक सहस नर, बिनु गुन लहै न कोय। 

जैसे कागा कोकिला सबद सुनै सब कोय। 

सबद सुनै सब कोय, कोकिला सबै सुहावन। 

दोउ कौ एक रंग, काग सब भए अपावन। 

कह गिरिधर कविराय, सुनों हो ठाकुर मन के।"

2. दौलतराय न कीजिये, सपने हूँ अभिमान 

चंचल जल दिन चारि को, छाँव न रहत निदान। 

ठाँव न रहन निदान, जियत जग में जस लीजै,

मीठे वचन सुनाय विनय सबही की कीजै,

कह गिरधर कविराय, अरे यह सब घट डोलत,

पाहुन निसि दिन चार, रहत सबही के दौलत।।

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