विप्रलम्भ श्रृंगार रस हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह श्रृंगार रस का एक प्रकार है जिसमें नायक और नायिका के मिलन की अभिलाषा और उसका पूरा न होना दर्शाया जाता है। यह रस प्रेमियों के विरह के दर्द, उनके मनोदशा और उनके आंतरिक संघर्ष को बड़ी ही मार्मिकता से व्यक्त करता है। विप्रलम्भ श्रृंगार रस की परिभाषा भोजराज के अनुसार , "जहाँ रति नामक भाव प्रकर्ष को प्राप्त करे, लेकिन अभीष्ट को न पा सके, वहाँ विप्रर्लभ-श्रृंगार कहा जाता है।" भानुदत्त के अनुसार , "युवा और युवती की परस्पर मुदित पंचेन्द्रियों के पारस्परिक सम्बन्ध का अभाव अथवा अभीष्ट अप्राप्ति विप्रलम्भ है।" सरल शब्दों में कहें तो - विप्रलम्भ श्रृंगार में प्रेमी और प्रेमिका के मिलन की इच्छा तो होती है लेकिन वे एक-दूसरे से दूर रहते हैं, जिससे उनके मन में विरह की पीड़ा उत्पन्न होती है। विप्रलम्भ श्रृंगार रस के लक्षण विरह : प्रेमी और प्रेमिका का एक-दूसरे से अलग होना। व्यथा : विरह के कारण उत्पन्न होने वाला मानसिक कष्ट। आकांक्षा : प्रियतम को पाने की तीव्र इच्छा। विलाप : विरह के कारण होन...
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