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भ्रमर गीत सार : सूरदास पद क्रमांक 25 सप्रसंग व्याख्या By Khilawan

Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya

अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने भ्रमर गीत के पद क्रमांक 24 की व्याख्या को अपने इस ब्लॉग questionfieldhindi.blogspot.com में पब्लिस किया था। आज हम भ्रमर गीत पद क्रमांक 25 की सप्रसंग व्याख्या के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या

पद क्रमांक 25 व्याख्या

- सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल 

25. राग नट

आये जोग सिखावन पाँड़े।
परमारथि पुराननि लादे ज्यों बनजारे टांडे।।
हमरी गति पति कमलनयन की जोग सिखै ते राँडें।
कहौ, मधुप, कैसे समायँगे एक म्यान दो खाँडे।।
कहु षटपद, कैसे खैयतु है हाथिन के संग गाड़े।
काहे जो झाला लै मिलवत, कौन चोर तुम डाँड़े।।
सूरदास तीनों नहिं उपजत धनिया, धान कुम्हाड़े।।


शब्दार्थ :

जोग=ज्ञान-योग। परमार्थी=परमार्थ की शिक्षा देने वाले। बंजारे=खानादोष, इधर-उधर घूमने वाला। पुराननि=पुराणों की, पुरानी, बासी। टाँडे=सौदा, व्यपार की वस्तु। राँडे=विधवा। खाँडे=तलवार। षट्पद=भौंरा। गाँड़े=गन्ना। बयारी=हवा। भखि=खाकर। माँड़े=खाने, तैयार किए। झाल=बकवास, झल्ल। डाँड़े=दंड। कुम्हाड़े=कुम्हड़ा,काशीफल, कद्दू, पेठा।

संदर्भ :

प्रस्तुत पद्यांश हमारे एम. ए. हिंदी साहित्य के मध्यकालीन काव्य से लिया गया है जिसके रचियता सूरदास जी हैं, सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग :

प्रस्तुत पद्य में उद्धव के ज्ञान योग की शिक्षा से गोपियाँ नाराज और उदास हैं, उस समय जो वो कहती हैं इस पंक्ति या पद में बताया गया है।

व्याख्या :

हे उद्धव तुम पाँड़े के समान हमें जोग सिखाने के लिए आ गए। जिस प्रकार बंजारे लोग अपने सिर पर माल लादे-लादे बेचने के लिए घूमते फिरते हैं उसी प्रकार तुम भी पाँड़े के समान परमार्थ की शिक्षा देने वाले पुराणों के ज्ञान के बोझ को अपने सिर पर लादे-लादे फिर रहे हो क्या तुम योग को सिखाने वाले पांडे के समान अपने परमार्थ रूपी पुरानी बासी वस्तु को लिए फिरते हो और अपने ऊपर मढ़ना चाहते हो।

हमारी गति तो अपने पति के साथ है और हमारे पति कमल नयन हैं श्री कृष्ण हैं जो हमें शरण और प्रतिष्ठा देने वाले हैं यह योग हमारे लिए नही है यह योग तो उनके लिए है जो विधवा और अनाथ हैं हमारे पति अभी जीवित हैं अतः हमारे लिए योग विकार की वस्तु है।

हे उद्धव तुम्ही बताओ एक ही मियान में दो तलवार कैसे समा सकती हैं। जिस प्रकार एक म्यान में दो तलवार नही समा सकती हैं। उसी प्रकार हमारे लिए योग सीखना भी बेकार है क्योकि योग की साधना हमारे लिए असम्भव है हमारे हृदय में तो श्री कृष्ण समाये हुए हैं। इसमें योग नहीं समा सकता। इसमें तो तुम्हारे निर्गुण ब्रम्ह की समाई नही हो सकती।

हे भवरे हे उद्धव हमें बताओ किस प्रकार हाथी के साथ गन्ने को खाया जा सकता है। क्योकि हाथी तो एक ही बार में अनेक गन्ने खा जाता है जिस प्रकार हाथी के साथ गन्ना खाने में मनुष्य कोई होड़ नही कर सकता स्पर्धा नही कर सकता उसी प्रकार हम अबला नारियों के लिए योग मार्ग की कठिन और दुरूह साधना करना कठिन है।

हे उद्धव बिना दूध, रोटी और घी खाये केवल हवा के भक्षण से अर्थात तुम्हारा ये प्राणायाम करने से तुम्हारा योग करने से किसकी भूख मिट सकती है। अर्थात कोई जीवित नही रह सकता अर्थात जिस प्रकार यह असम्भव है, की केवल प्राणायाम से भूख मिट जाय उसी प्रकार हमारे लिए भी योग की साधना करना असम्भव है।

गोपियाँ कह रही हैं की तुम किस वजह से यह बातें बना बना के व्यर्थ की बकवास कर रहे हो आखिर हमने ऐसी कौन सी चोरी कि है जिसका तुम हमें दण्ड देने आये वास्तव में तुम स्वयं चोर हो क्योकि जो हमारे सर्वस्व हैं कृष्ण और हमारे हृदय में विराजमान हैं तुम हमसे छीनकर ले जाने के लिए आये हो तुम अच्छी प्रकार जानते हो की धनिया धान और काशीफल इन तीनों की खेती एक स्थान पर होना सम्भव नही है असम्भव है इसीलिए हमारे लिए श्री कृष्ण को छोड़कर तुम्हारे परब्रम्ह को स्वीकार करना असम्भव है।


विशेष :
  • व्यंजना तथा लक्षणा शब्द शक्ति से भाषा की वाग्वैदग्धता में वृद्धी हुई है।
  • धनिये की खेती शीत ऋतू में धान की वर्षा की ऋतू में और काशी फल की खेती ग्रीष्म ऋतू में होती है और इसीलिए तीनों की खेती एक साथ एक जगह पर या स्थान पर होना असम्भव है।
  • तीनों नहीं उपजता से कुछ विद्वान भक्ति, योग और ज्ञान का अर्थ लेते हैं किन्तु यह उचित नही है की तीनों का समन्वय कबीर जैसे ज्ञानमार्गी कवियों में उपलब्ध है।
  • एक म्यान दो खाण्डे में जैसे दो लोकोक्ति का प्रयोग सूरदास जी द्वारा किया गया है।
  • "परमार्थी पुरनानी लावे ज्यों बंजारे टांडे में" उपमा अलंकार का प्रयोग हुआ है।

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