भ्रमरगीत सार आचार्य रामचंद्र शुक्ल अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने भ्रमर गीत के पद क्रमांक 87 की व्याख्या को अपने इस ब्लॉग questionfieldhindi.blogspot.com में पब्लिस किया था। आज हम भ्रमर गीत पद क्रमांक 88 की सप्रसंग व्याख्या के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय (PRSU) के एम.ए. हिंदी साहित्य (MA Hindi) के पाठ्यक्रम में ' भ्रमरगीत सार ' (संपादक: आचार्य रामचंद्र शुक्ल) द्वितीय सेमेस्टर (Second Semester) के अंतर्गत पढ़ाया जाता है। यह पुस्तक दूसरे सेमेस्टर के मध्यकालीन काव्य प्रश्न-पत्र के पाठ्यक्रम का मुख्य हिस्सा है। भ्रमरगीत सार की व्याख्या पद क्रमांक 88 व्याख्या - सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल bhrmar-geet-sar-surdas-ke-pad - 88 श्री कृष्ण का वचन उद्धव-प्रति 88. राग गौरी ऊधो ! क्यों राखौं ये नैन ? सुमिरि सुमिरि गुन अधिक तपत हैं सुनत तिहारो बैन।। हैं जो मन हर बदनचंद के सादर कुमुद चकोर। परम-तृषारत सजल स्यामघन ...
1. भारतीय साहित्य के अध्ययन की तीन समस्याओं की चर्चा कीजिये। उत्तर - भारतीय साहित्य को समझने में आने वाली 3 सबसे बड़ी मुश्किलें हमारा देश जितना बड़ा है, यहाँ का साहित्य भी उतना ही विशाल और अनोखा है। लेकिन जब पूरे 'भारतीय साहित्य' को एक साथ पढ़ने या समझने की बात आती है, तो पाठकों और शोधकर्ताओं के सामने ये 3 मुख्य दिक्कतें आती हैं: 1. बहुत सारी भाषाएँ, एक नज़रिए की कमी भारत किसी एक भाषा का देश नहीं है। यहाँ तमिल, बांग्ला, मराठी, हिंदी, असमिया, कन्नड़ जैसी दर्जनों समृद्ध भाषाएँ हैं। दिक्कत यह है कि कोई भी व्यक्ति सारी भाषाएँ नहीं जान सकता। ज़्यादातर लोग सिर्फ अपनी भाषा का साहित्य पढ़ते हैं और उसी को आधार मान लेते हैं। इस वजह से पूरे देश के साहित्य को एक साथ जोड़कर देखने वाला 'साझा इतिहास' तैयार करना आज भी सबसे बड़ी चुनौती है। 2. अच्छे अनुवादों (Translation) का न होना एक भाषा की अच्छी रचना दूसरी भाषा के पाठक तक तभी पहुँच सकती है जब उसका अनुवाद बेहतरीन हो। दक्षिण भारत या पूर्वोत्तर (North-East) के शानदार उपन्यासों और कविताओं का हिंदी या अन्य भाषाओं में बहुत कम अनुवा...
(1) 'रामचंद्रिका' के रचनाकार कौन हैं? उत्तर - रामचंद्रिका के रचनाकार केशवदास हैं। इसकी रचना 1601 ई. (संवत 1658) में हुई थी। यह रीतिकाल का एक अत्यंत प्रसिद्ध प्रबंध काव्य है, जिसमें भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र का वर्णन किया गया है। विविध छंदों के प्रचुर प्रयोग के कारण प्रसिद्ध आलोचक डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने इसे "छंदों का अजायबघर" कहा है। स्मरणीय तथ्य जो आपको याद रखना चाहिए - 1. 'रामचंद्रिका' के रचयिता / रचनाकार रचनाकार: आचार्य केशवदास रचना वर्ष: 1601 ई. (संवत 1658) विशेष तथ्य: विविध छंदों के व्यापक प्रयोग के कारण डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने 'रामचंद्रिका' को "छंदों का अजायबघर" कहा है। आचार्य केशवदास को 'कठिन काव्य का प्रेत' भी कहा जाता है। 2. 'रामचंद्रिका' किस काल का महाकाव्य है? काल: रीतिकाल काव्यधारा: रीतिबद्ध शाखा स्वरूप: यह प्रबंधात्मक शैली में रचा गया एक प्रसिद्ध महाकाव्य है, जिसमें भगवान श्रीराम की कथा का 39 प्रकाशों (अध्यायों) में निरूपण किया गया है। 3. 'अनुभव चंद्रिका' किसकी रचना है? रचनाकार: मलू...
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