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मौखिक भाषा की प्रकृति

 मौखिक भाषा की प्रकृति 

 रेडियो हो या टेलीविजन, भाषा की आवश्यकता सभी जनसंचार माध्यमों को है। बिना भाषा के ये दोनों माध्यम गूंगे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो भाषा प्राथमिक संचार माध्यम है, रेडियो टेलीविजन साधन है। यह साधन या उपकरण जनसंचार माध्यम तभी है जब इनके पास भाषा है। यह भाषा हमारी अपनी है। हमारी वाणी के बिना यह उपकरण मृत हैं। 

 भाषा के मुख्यतः तीन रूप है -

  1. लिखित रूप - इसका प्रयोग मुद्रण जनसंचार माध्यम में होता है। 
  2. मौखिक रूप - यह वह भाषा है जो बोलकर संदेशों को व्यक्त करता है या संप्रेषित करता है। 
  3. सांकेतिक - भाषा का तीसरा रूप है सांकेतिक भाषा हम सब कभी-कभी बिना बोले केवल अंगों के संचालन से भावों और विचारों को व्यक्त करते हैं। 

 रेडियो की भाषा मौखिक होती है और मौखिक भाषा का संबंध ध्वनि से है। ध्वनि के उतार-चढ़ाव से है। रेडियो अपनी प्रकृति में श्रव्य माध्यम है इसलिए उसकी भाषा मुद्रण, दृश्य आदि माध्यमों से भिन्न है। मतलब यह है कि रेडियो की अपनी अलग भाषा है।

 रंगमंच, फिल्म  और रेडियो के लिए लिखे गए नाटकों में भी काफी अंतर होता है, क्योंकि जो सुविधाएं रंगमंच और फिल्म के नाटकों को उपलब्ध हैं, वे रेडियो नाटक के पास नहीं। रेडियो दृश्य नहीं श्रव्य है अर्थात इसे केवल सुना जाता है देखा नहीं जाता जबकि टीवी दृश्य और श्रव्य दोनों ही है उसे सुना जाता है और देखा भी जाता है। 

रेडियो श्रव्य है इसलिए इसमें भाषा की प्रकृति सबसे भिन्न मौखिक होती है। श्रव्य साधन केवल तीन ही हैं - भाषा, संगीत और ध्वनि प्रभाव। इन तीनों का आधार ध्वनि है। इसलिए यहां अभिव्यक्ति का सशक्त और सफल साधन है। ध्वनि की अभिव्यंजना इस बात पर निर्भर है कि कोई ध्वनि कितने जोर और कितने अंतर में पाई जाती है। उसकी लय कितनी और किस मात्रा में हैं। ध्वनि के यह गुण सभी श्रव्य कलाओं की सृजनात्मक साधन है। सामान्य जीवन में देखने में आता है कि ध्वनि परिवर्तन के कारण शब्द के अर्थ में परिवर्तन आ जाता है। "मैंने आप से एक किताब मंगाई थी" इस वाक्य के प्रत्येक शब्द पर अलग-अलग बलाघात देने से हर बार इसका अर्थ बदल जाएगा। 

 कहने का आशय यह है कि भाषा रेडियो का प्राण है। रेडियो नाटक लेखक दृश्य तत्वों की कमी की पूर्ति शब्दों की सहायता से करता है। यहां शब्दों के लिखित रूप की अपेक्षा मौखिक रूप या ध्वनि, उच्चारण, उतार-चढ़ाव पर अधिक बल दिया जाता है। रेडियो नाटक या अन्य प्रसारण में ध्वनि पर ही विशेष ध्यान दिया जाता है। बोलने पर शब्दों की जिस ध्वनि का हम श्रवण करते हैं वही रेडियो नाटक लेखक का साधन है। प्रिंटिंग मशीन के कारण यद्यपि शब्दों के लिखित रूप का प्रचलन और महत्व बढ़ गया है किंतु रेडियो के कार्यक्रमों में इस लिखित रूप का कोई महत्व नहीं है। वीडियो के प्रसारण आदि में इस बात का विशेष ध्यान दिया जाता है कि किन शब्दों और वाक्यों का प्रभाव श्रोता पर पड़ेगा। एक उदाहरण के द्वारा इसे स्पष्ट किया जा सकता है -

भाषा का लिखित रूप - "कहीं अजीब देश में पहुंच गई हूं जहां चारों ओर फूल ही फूल हैं, जिन्हें हम गूलर-पाकड़-पीपल कहते हैं। उनमें भी फूल लगे हैं - चंपा के, गुलाब के, पारिजात के। "

मौखिक रूप - "कितना सुंदर देश है यह! फूलों का देश! राशि राशि के फूल। चारों ओर फूल ही फूल चंपा के, गुलाब के, पारिजात के।"

हम यहां देखते हैं कि भाषा के लिखित रूप में प्रवाह और गति नहीं है जबकि मौखिक रूप में एक विशेष प्रकार का प्रवाह और गति है। रेडियो की भाषा की प्रकृति का उदाहरण मौखिक रूप में है। रेडियो में श्रोता एक शब्द को दूसरा सुन नहीं सकता। यहां श्रोता को रेडियो वाचक पर निर्भर रहना पड़ता है। 

 इस प्रकार रेडियो में भाषा की प्रकृति मौखिक रूप को लिए होती है। रेडियो लेखक के पास शब्दों का अच्छा भंडार होता है इसलिए एक ही शब्द का बार-बार प्रयोग ना करके उससे के उस शब्द के पर्याय का प्रयोग करता है। अतः स्पष्ट है कि रेडियो पर मौखिक रूप से प्रयुक्त होने वाली भाषा का प्रयोग किया जाता है, जिसकी प्रकृति सहजता, सरलता और स्वाभाविकता को लिए होती है। 

 रेडियो की भाषा सरल, सहज और बोधगम्य होनी चाहिए। उसमें निरर्थक और औपचारिक शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता। रेडियो की भाषा में आंकड़ों का भी कम से कम उपयोग होता है। कठिन अप्रचलित शब्दों, मुहावरे और लोकोक्तियों का भी प्रयोग नहीं किया जाता। बल्कि लंबे और संयुक्त वाक्य भी प्रयुक्त नहीं होते। आडंबर पूर्ण और भारी-भरकम भाषा का प्रयोग नहीं होता। 

रेडियो की भाषा में निम्न तथ्यों का ध्यान रखना  चाहिए

  1.  सामान्य बोलचाल के शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
  2.  वाक्य सरल हो, छोटे छोटे हो तथा शुद्ध तथा रोचक हों। 
  3. विषय के अनुरूप उसमें प्रभाव क्षमता होनी चाहिए। 
  4.  भारी-भरकम शब्दावली, व्यर्थ का शब्दाडंबर और उलझे हुए वाक्य रेडियो लेखन के लिए शत्रु है। 
  5.  सर्वजन संवेद्य शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए ताकि किसी को शब्दकोश ना देखना पड़े। 
  6.  संवादों की भाषा में चुस्ती, कसाव, तेजी, पात्र अनुकूलता और घटनानुकूलता होनी चाहिए। 
  7.  रेडियो की भाषा में रोजमर्रा, आम बोलचाल की भाषा के शब्द हों।
  8.  विस्तृत, लंबे वाक्य रेडियो के लिए अनुपयुक्त हैं। 
  9.  हर शब्द का प्रयोग सोदेश्य से होना चाहिए। 

 डॉक्टर हरिमोहन के अनुसार रेडियो की शब्दावली तीन तरह की सामग्री से निर्मित होती है:-

  1. वाक् (Speech),
  2. ध्वनि प्रभाव (जिसमें संगीत भी शामिल है),
  3. मौन (Silence)।

1. वाक् - वाक का अर्थ है वाणी वाणी है इसमें श्रोताओं का ध्यान आकर्षित करने के लिए वक्ता को या रेडियो वाचक को उतार-चढ़ाव या सुरताल और स्वर पर विशेष ध्यान देना चाहिए

2. ध्वनि प्रभाव - ध्वनि प्रभाव के द्वारा वास्तविक या काल्पनिक सभी तरह के दृश्य सामने लाने में सहायता मिलती है। ध्वनियां ही रेडियो कार्यक्रम का निर्माण करती है। इस कार्य में उद्घोषक प्रत्येक ध्वनि के कार्य को अच्छी तरह समझता है। ध्वनि प्रभाव जब शब्द और संगीत के साथ पैदा किए जाते हैं तो पात्र की मनोदशा को व्यक्त करते हैं। इसलिए कभी तेज ध्वनि से धीरे-धीरे मध्यम ध्वनि और कभी मद्धिम ध्वनि से तेज ध्वनि का प्रयोग करना चाहिए। 

3. मौन - प्रसारण में मौन का भी महत्व है। लगातार एक ही तरह की ध्वनियों का प्रसारण प्रयोग नीरसता की सृष्टि करता है। मौन लय पैदा करने और समग्र ध्वनि रचना को संतुलित करने में सहायक है। 

maukhik bhasha ki prkriti.

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