हिंदी साहित्य- बिहारी रत्नाकर -सतसई बिहारी रत्नाकर के दोहे सम्पादक - जगन्नाथ दास रत्नाकर Bihari Satsai Sampadak Jagannath Das Ratnakar 50 Dohe Hindi Sahitya part one दीरघ साँस न लेहि दुख, सुख साईहिं न भूलि। दई दई क्यौं करतु है, दई दई सु क़बूलि।।51।। बैठि रही अति सघन बन, पैठि सदन-तन माँह। देखि दुपहरी जेठ की छाँहौं चाहति छाँह।।52।। हा हा! बदनु उघारि, दृग सफल करैं सबु कोइ। रोज सरोजनु कैं परै, हँसी ससी की होइ।।53।। होमति सुखु, करि कामना तुमहिं मिलन की, लाल। ज्वालामुखी सी जरति लखि लगनि-अगनि की ज्वाला।।54।। सायक-सम मायक नयन, रँगे त्रिबिध रँग गात। झखौ बिलखि दूरि जात जल, लखि जलजात लजात।।55।। मरी डरी कि टरई बिथा, कहा खरी, चलि चाहि। रही कराहि कराहि अति, अब मुँह आहि न आहि।।56।। कहा भयौ, जौ बीछुरे, मो मनु तोमन-साथ। उड़ी जाउ कित हूँ, तऊ गुड़ी उड़ाइक हाथ।।57।। लखि लोन लोइननु कैं, कौइनु, होई न आजु। कौन गरीबु निवाजिबौ, कित तूठ्यौं रातिराजु।।58।। सीतलताउरू सुबास कौ घटे न महिमा-मूरु। पीनस वारैं जौ तज्यौ सोरा जानि कपूरु।।59।। कागद पर लिखत...
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