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Showing posts from September, 2024

शास्त्रीय समीक्षा पद्धति पर प्रकाश डालिए।

 • दीर्घ उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. शास्त्रीय समीक्षा पद्धति पर प्रकाश डालिए। Shastriya Samiksha paddti per Prakash daliye उत्तर- समीक्षा पद्धति शास्त्रीय समीक्षा पद्धति के दो रूप हैं- (1) सिद्धान्त निर्माण (2) सैद्धान्तिक आधार पर समीक्षा। आलोचना का शास्त्रीय पक्ष सैद्धान्तिक आलोचना कहलाता है। साहित्य का स्वरूप स्थिर होने पर आलोचक की प्रतिभा द्वारा निर्मित सिद्धान्त समय के साथ साहित्य के नियामक तत्व बन जाते हैं, जिनके आधार पर एक आलोचना-शास्त्र खड़ा होता है। शास्त्रीय आलोचना के अन्तर्गत काव्यशास्त्र सम्बन्धी सभी प्रकार की नवीन प्राचीन तत्व निरूपिणी आलोचनाएँ आ जाती है। इसी को सैद्धान्तिक आलोचना भी कहा जा सकता है- यह आलोचना आलोचना-शास्त्र के नाना प्रकार के सिद्धान्तों पर विचार करती है। समीक्षा-शास्त्र सार्वकालिक एवं सार्वदेशिक न होकर परिवर्तनशील है। सिद्धान्त निर्धारण सम्बन्धी आलोचना- प्रत्यालोचना सैद्धान्तिक समालोचना का अंग है। इसके अन्तर्गत साहित्य से सम्बद्ध विविध विषयों काव्य, नाटक, उपन्यास, कया, निबन्ध, जीवनी आदि के रूप का सम्यक् विश्लेषण करके उनके लक्षण निश्चित किए जाते हैं। इसम...

डॉ नगेन्द्र मनोवैज्ञानिक समीक्षक क्यों है ?

  प्रश्न 4. डॉ नगेन्द्र मनोवैज्ञानिक समीक्षक क्यों है ? उत्तर - डॉ. नगेन्द्र मनोवैज्ञानिक समीक्षक के रूप में स्वीकार किये जाते है, यद्यपि वे भी छायावाद युग के ही हैं। डॉ. नगेन्द्र ने मनोवैज्ञानिक भूमिका पर काव्य के स्वरूप का निर्माण किया है। काव्यानुभूति को उन्होंने ऐन्द्रिय और बौद्धिक अनुभूति के मध्य की वस्तु माना है। उन्होंने लिखा है कि काव्यानुभूति है तो ऐन्द्रिय अनुभूति, परन्तु साधारण नहीं, मानित (contemplated) अनुभूति है। काव्यानुभूति ऐन्द्रिय अनुभूति के समान प्रत्यक्ष और तीव्र नहीं होती। इसका कारण यह है कि यह प्रत्यक्ष घटना का अनुभव नहीं है। आवना में पहले कवि फिर दर्शक या सहृदय को बुद्धि का उपयोग करना पड़ता है। इस प्रकार यह एक भिन्न प्रकार का संवेदन है और "मैं कविता या कला के पीछे आत्माभिव्यक्ति की प्रेरणा मानता हूँ चूँकि आत्म के निर्माण में कामवृत्ति या अतृप्तियों का योग है, इसलिए इस प्रेरणा में उनका विशेष महत्व मानता हूँ।" डॉ. नगेन्द्र के उपर्युक्त शब्द इन्हें मनोवैज्ञानिक समीक्षक के रूप में ही सिद्ध करते हैं। Doctor Nagendra manovaigyanik samikshak kyon Hain. लघु उत्...

ऐतिहासिक आलोचना पर प्रकाश डालिए।

 प्रश्न 3. ऐतिहासिक आलोचना पर प्रकाश डालिए। उत्तर - ऐतिहासिक आलोचना पद्धति में आलोचक तत्कालीन परिस्थितियों का विश्लेषण कर उसकी पृष्ठभूमि में किसी कृतिकार की कृतियों की परीक्षा (समीक्षा) करता है। रामकाव्य की रचना बाल्मीकि, तुलसी, केशव, मैथिलीशरण गुप्त ने की किन्तु उनकी कृतियों में पाया जाने वाला अन्तर तद्‌युगीन परिस्थितियों की देन है जब तक युगीन इतिहास को नहीं समझा जायेगा तब तक सही आलोचना नहीं हो सकती। ऐतिहासिक आलोचना ने समीक्षा को नई दिशा दी है। हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रन्थों में कवियों और उनकी कृतियों की समीक्षा तद्‌युगीन परिस्थितियों के आलोक में ही की गयी है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी एवं आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की समीक्षा पद्धति में ऐतिहासिक आलोचना की विशेषताएँ देखी जा सकती है। Aitihasik aalochana per Prakash daliye. लघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1.  मनोविश्लेषणवादी आलोचना पद्धति पर प्रकाश डालिए। प्रश्न 2.  तुलनात्मक आलोचना पर प्रकाश डालिए। प्रश्न 3.  ऐतिहासिक आलोचना पर प्रकाश डालिए। प्रश्न 4.  डॉ नगेन्द्र मनोवैज्ञानिक समीक्षक क्यों है ?

तुलनात्मक आलोचना पर प्रकाश डालिए।

प्रश्न 2. तुलनात्मक आलोचना पर प्रकाश डालिए। उत्तर - इस आलोचना पद्धति का सूत्रपात 19वीं शती से हुआ। इसका क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है और यह कई प्रकार से हो सकती है, यथा-(i) दो काव्य कृतियों की तुलना, (ii) दो कृतियों की तुलना, (iii) दो कवियों की तुलना, (iv) दो भिन्न भाषाओं के कवियों की तुलना, (v) विभिन्न युगों के कवियों की तुलना, (vi) एक ही कवि की दो कृतियों की तुलना। तुलना के लिए कुछ समान आधार खोजकर अपनी राय आलोचक देता है। हिन्दी में 'देव और बिहारी' की तुलना लाला भगवानदीन एवं पद्‌मसिंह शर्मा ने अपने-अपने मानदण्डों के आधार पर करते हुए एक ने बिहारी को तो दूसरे ने देव को श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास किया है। Tulnatmak aalochana per Prakash daliye. लघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1.  मनोविश्लेषणवादी आलोचना पद्धति पर प्रकाश डालिए। प्रश्न 2.  तुलनात्मक आलोचना पर प्रकाश डालिए। प्रश्न 3.  ऐतिहासिक आलोचना पर प्रकाश डालिए। प्रश्न 4.  डॉ नगेन्द्र मनोवैज्ञानिक समीक्षक क्यों है ?

मनोविश्लेषणवादी आलोचना पद्धति पर प्रकाश डालिए

प्रश्न 1. मनोविश्लेषणवादी आलोचना पद्धति पर प्रकाश डालिए। उत्तर - आलोचना के भेदों में मनोविश्लेषणवादी आलोचना का महत्वपूर्ण स्थान है। मनोविज्ञान के सिद्धान्तों के आधार पर पात्रों का मनोविश्लेषण करते हुए जब किसी साहित्यिक कृति की समीक्षा की जाती है तब उसे मनोविश्लेषणवादी समीक्षा कहा जाता है। फ्रायड, एडलर एवं युंग ने यह प्रतिपादित किया कि मानव मन में दमित काम-भावनाएँ, कुंठाएँ विद्यमान रहती हैं। अचेतन में दमित ये कुण्ठाएँ एवं काम-भावनाएँ मानव के बाह्य क्रिया-कलापों को प्रभावित करती हैं अतः साहित्य का विश्लेषण इसी के सन्दर्भ में होना चाहिए। हीनता ग्रन्थि भी व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करती है। इस आलोचना पद्धति में कृति के साथ-साथ कृतिकार की मानसिक स्थितियों का विश्लेषण किया जाता है। साहित्य रचना प्रक्रिया का मनोविज्ञान के मान्य सिद्धान्तों के आधार पर विश्लेषण करना मनोविश्लेषणात्मक आलोचना है। हिन्दी में अज्ञेय, जैनेन्द्र एवं इलाचन्द्र जोशी की औपन्यासिक कृतियों का मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है। Manovishleshan vadi aalochana paddhti per Prakash daliye. लघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. ...

हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंधों को क्या कहा जाता है?

 1. हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंधों को क्या कहा जाता है? उत्तर - हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंधों को ललित निबंध कहा जाता है। Hajari Prasad Dwivedi ke nibandhon ko kya kaha jata hai.