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Showing posts from July, 2022

रीति सिद्धान्त पर प्रकाश डालते हुए उसका संक्षेप में परिचय दीजिए।

 रीति सिद्धान्त प्रश्न 4. रीति सिद्धान्त पर प्रकाश डालते हुए उसका संक्षेप में परिचय दीजिए। उत्तर - रीति सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य वामन ने रीति को काव्य की आत्मा माना है - 'रीतिरात्मा काव्यस्य ।'       रीति के अर्थ के सम्बन्ध में विद्वानों के विभिन्न मत है। वामन इसे विशिष्ट पद-रचना मानते हैं। विशिष्ट से उनका अर्थ गुणयुक्तता से है - 'विशिष्टा पद रचना रीतिः।'     गुण को वे काव्य का शोभाकारक गुण मानते हैं। वामन के अनुसार वह काव्य शोभाकारक शब्द और अर्थ के धर्मों से युक्त पद रचना है।   डॉ. कृष्णदेव झारी ने आचार्य वामन की परिभाषा को इस प्रकार प्रस्तुत किया है—“उनके अनुसार पद रचना की विशिष्टता का आधार गुण है - विशेषो गुणात्मा । विशेष गुणों के प्रयोग से पद-रचना (रीति-शैली) में विशिष्टता आती है। गुण को वामन ने काव्य-शोभा का कारक कहा है।" Contents [ hide ] रीति शब्द की व्युत्पत्ति     संस्कृत की रीड् धातु से बना शब्द 'रीति' गति, चलन, मार्ग, पथ, बीथी, शैली, ढंग, कार्यविधि आदि अर्थों का वाचक है। 'सरस्वती-कंठाभरण' के रचयिता ...

विभिन्न आचार्यों द्वारा किये गये अलंकारों के वर्गीकरण का परिचय दीजिए।

अलंकारों का वर्गीकरण प्रश्न 3. विभिन्न आचार्यों द्वारा किये गये अलंकारों के वर्गीकरण का परिचय दीजिए।   Contents [ hide ] उत्तर - काव्यशास्त्र में रस सूत्र चाहे भरतमुनि का प्रचलित हो और उन्हें रसवादी आचार्य माना जाता हो, परन्तु काव्य की आत्मा सबसे पहले अलंकार को माना गया। सबसे पहले अलंकारवादी आचार्य भामह हैं।  प्रमुख अलंकारवादी आचार्य दण्डी माने जाते हैं। इन्होंने अलंकारों की संख्या 37 मानी है। इनके बाद अलंकारवादी आचार्य भामह हुए। इन्होंने दण्डी के कुछ अलंकारों को माना और कुछ को नहीं माना। इन्होंने अपनी ओर से निम्नलिखित 6 अलंकार प्रस्तुत किये - (1) अनुप्रास, (2) उपमारूपक, (3) उत्प्रेक्षावयव, (4) उपमेयोपमा, (5) सन्देह, तथा (6) अनन्वय ।       इसके बाद अलंकारवादी आचार्य उद्द्भट का नाम आता है। इन्होंने दण्डी और भामह के कुछ अलंकारों को स्वीकार किया और कुछ को अमान्य कर दिया। इन्होंने अपनी ओर से निम्नलिखित सात नये अलंकार प्रस्तुत किये - (1) पुनरुक्तवदाभास, (2) छेकानुप्रास, (3) लाटानुप्रास, (4) प्रतिवस्तूपमा, (5) काव्यलिंग, (6) दृष्टान्त, तथा ...

अलंकार सिद्धान्त की मूल स्थापनाओं का वर्णन कीजिए।

अलंकार सिद्धान्त की मूल स्थापनाएँ प्रश्न 2. अलंकार सिद्धान्त की मूल स्थापनाओं का वर्णन कीजिए। अथवा अलंकार सिद्धान्त के अन्तर्गत कौन-सी मूल स्थापनाएँ की गयी है ? उन पर प्रकाश हालिए।  Contents [ hide ] परिचय उत्तर - काव्यशास्त्र का सबसे प्राचीन अथवा पहला सम्प्रदाय रस सम्प्रदाय है, जिसका आरम्भ 'नाट्यशास्त्र' के स्वचिता भरतमुनि से होता है। इसके पश्चात् काव्यशास्त्र में जिससे सम्प्रदाय का आरम्भ हुआ, वह अलंकार सम्प्रदाय था। इसका आरम्भ 'अग्निपुराण' के रचयिता आचार्य वेदव्यास ने किया। अलंकार समप्रदाय के प्रवर्तक तो अग्निपुराण के रचयिता आचार्य वेदव्यास हैं, पर सम्प्रदाय के रूप में इसकी स्थापना करने का श्रेय 'काव्यालंकार' के रचयिता आचार्य भामह को है। आचार्य भामह ने प्रमुख रूप से काव्यालंकारों तथा उनसे सम्बन्धित गुण-दोषों का विवेचन किया है। भामह के 'काव्यालंकार' ग्रंथ के आधार पर ही इस सम्प्रदाय का नाम ' काव्यालंकार-शास्त्र ' पड़ा। यह अलंकार सिद्धान्त रस सिद्धान्त का समकालीन सिद्धान्त था। इसके समकालीन होने का प्रमाण यह है कि इन दोनों सिद्धान्तों की...

अलंकार सिद्धान्त विकास की परिस्थियाँ एवं प्रमुख मान्यताओं का परिचय

• दीर्घ उत्तरीय प्रश्न अलंकार सिद्धान्त प्रश्न 1. अलंकार सिद्धान्त का विकास किन परिस्थितियों में हुआ, इसके विकास पर प्रकाश डालते हुए इस सिद्धान्त की प्रमुख मान्यताओं का परिचय दीजिए।   Contents [ hide ] उत्तर - भारतीय काव्यशास्त्र में विभिन्न सिद्धान्तों का उदय काव्य की आत्मा के विवाद को लेकर हुआ। अलंकार सिद्धान्त के आचार्यों ने 'अलंकार' को ही काव्य की आत्मा स्वीकार किया है। यों तो अलंकारों के उदाहरण वेदों की संहिताओं में भी उपलब्ध हैं। यथा- ऋग्वेद संहिता में अनुप्रास, यमक, उपमा, रूपक, रूपकातिशयोक्ति, व्यतिरेक आदि अलंकारों के उदाहरण उपलब्ध हैं, पर संस्कृत के अलंकार-विवेचन का क्रमबद्ध इतिहास 'नाट्यशास्त्र' (भरतमुनि) से प्रारम्भ माना गया है।  अलंकारवादी आचार्य - ये आचार्य अलंकार को ही काव्य की आत्मा मानते हैं और रस को अलंकार में ही समाहित कर लेते हैं। ऐसे प्रमुख आचार्य है - भामह, दण्डी, उद्भट, वामन, रुद्रट आदि।       (1) भामह — इन्होंने अपने 'काव्यालंकार' में सर्वप्रथम काव्यशास्त्रीय विषयों का वैज्ञानिक रीति से क्रमबद्ध विवेचन किया है। इसे कुछ विद्वा...

औचित्य के भेदों का वर्णन कीजिए।

 प्रश्न 16. औचित्य के भेदों का वर्णन कीजिए। औचित्य सिद्धांत के भेद उत्तर—औचित्य के आचार्य क्षेमेन्द्र ने औचित्य के 27 भेद बताए हैं। ये भेद निम्न प्रकार हैं - (1) पद, (2) वाक्य, (3) प्रबन्ध, (4) गुण, (5) अलंकार, (6) रस, (7) क्रिया, (8) कारक, (9) लिंग, (10) वचन, (11) विशेषण, (12) उपसर्ग, (13) निपात, (14) देश (15) काल, (16) कुल, (17) व्रत, (18) तत्व, (19) सत्य, (20) अभिप्राय, (21) विभाव, (22) सारसंग्रह, (23) प्रतिभा, (24) विचार (25) नाम, (26) आशीर्वचनम्, (27) प्रत्यय।  औचित्य सिद्धांत के विषय में इन बातों पर भी ध्यान देना चाहिए - (1) रसानुभूति में चमत्कार उत्पन्न करने वाला - औचित्य रसानुभूति में चमत्कार उत्पन्न करने में सक्षम होता है। इस प्रकार औचित्य रस का जीवन है। चमत्कार को भी रस का जीवन बताया जाता है।  (2) औचित्य सिद्धांत की मौलिकता - यह प्रश्न उपस्थित होता है कि औचित्य का सिद्धांत मौलिक है अथवा काव्य का सहायक सिद्धांत है। क्या औचित्य को दोष परिहार भी माना जा सकता है।  (3) औचित्य स्थापना काव्य के अंग के रूप में - कुछ आचार्य औचित्य को काव्य का अंग भी मान...

औचित्य सिद्धांत की स्थापनाओं का वर्णन कीजिए।

  प्रश्न 15. औचित्य सिद्धांत की स्थापनाओं का वर्णन कीजिए।  औचित्य सिद्धांत की स्थापनाएं उत्तर-औचित्य शब्द का अर्थ है - उचित का भाव। औचित्य सिद्धांत के संस्थापक आचार्य क्षेमेन्द्र हैं। उन्होंन औचित्य की जो परिभाषा प्रस्तुत की है, उसका अर्थ इस प्रकार है-"जो वस्तु अथवा तत्व किसी के निश्चय ही अनुरूप हो, उसे आचार्यों ने उचित कहा है। उचित का भाव ही औचित्य है।" औचित्य को काव्य का तत्व स्वीकार करते हुए कहा है - "औचित्य रससिद्ध काव्य का स्थिर जीवन है ।"       आचार्य क्षेमेन्द्र ने यह भी कहा है कि औचित्य के बिना अलंकार भी गुणयुक्त नहीं हो सकते । स्त्री पुरुष का उदाहरण देते हुए औचित्य की बात निम्न प्रकार कही है - कंठे मेखलया नितम्बफलके तारेण हारेण वा,  पाणौ नूपुर बन्धनेन चरणे केयूर पाशेन वा। शौर्येण प्रणते रिषौ करुणया नामान्ति के हास्यताम्।  (गले में करधनी, नितम्ब पर लम्बा हार, हाथ में नूपुर और चरणों में नूपुर बांधने से कौन-सी नारी तथा प्रणाम करने वाले के प्रति शूरता, शत्रु पर करुणा से कौन-सा पुरुष हंसी का पात्र नहीं बनता । औचित्य के बिना अल...

ध्वनिवादी काव्य के प्रमुख भेदों का वर्णन कीजिए।

 प्रश्न 12. ध्वनिवादी काव्य के प्रमुख भेदों का वर्णन कीजिए।  ध्वनिवादी काव्य के प्रमुख भेद उत्तर- आचार्य आनन्दवर्धन ने ध्वनि के निम्नलिखित दो भेद माने है- अविवक्षित वाच्य - लक्षणामूलक ध्वनि ही अविवक्षित वाच्य ध्वनि है। जिसका मुख्य अर्थ अविवक्षित रहे अर्थात् उसके कहने की इच्छा न हो, वहाँ अविवक्षित वाच्य ध्वनि होती है।  विवक्षितान्य पर वाच्य - अभिधामूलक ध्वनि के विवक्षितान्य पर वाच्य ध्वनि कहते हैं। जहाँ वाच्य अर्थ विवक्षित होने पर भी व्यंग्य अर्थ के प्रति निष्ठ होती है, वह विवक्षितानि पर वाच्य ध्वनि है।  ध्वनि काव्य के भेद -  ध्वनि काव्य के आनन्दवर्धन तथा अन्य ध्वनिवादी आचार्यों ने निम्नलिखित भेद माने हैं - अविवक्षित वाच्य - इस ध्वनि काव्य में वाव्य या तो अर्थान्तर में संक्रमित हो जाता है अथवा अत्यन्त तिरस्कृत हो जाता है। विवक्षित वाच्य ध्वनि - जहाँ पर वाच्य विवक्षित होता हुआ भी व्यंग्यनिष्ठ होता है, वहाँ उस काव्य का विवक्षित काव्य ध्वनि होता है। यहाँ पर अन्य पद व्यंग्यनिष्ठ  हैं अर्थात् विवक्षित वाच्य ध्वनि एक तथा असंलक्ष्य क्रम व्यंग्य ध्यनि और दूसरा स...

गुणीभूत व्यंग्य काव्य परिचय दीजिए।

  प्रश्न 13. गुणीभूत व्यंग्य काव्य परिचय दीजिए।   गुणीभूत व्यंग्य काव्य उत्तर- आचार्य मम्मट ने अपने काव्य प्रकाश में काव्य की परिभाषा करने के पश्चात् उसके निम्नलिखित तीन भेद किये हैं। उत्तम काव्य - वाच्य अर्थ की अपेक्षा व्यंग्य अर्थ में अधिक चमत्कार होने से वह उत्तम कहलाता है।  मध्यम काव्य - जहाँ पर वाच्यार्थ की अपेक्षा व्यंग्यार्थ में अधिक चमत्कार नहीं होता, उसे मध्यम काव्य कहा जाता है। उसे गुणीभूत व्यंग्य काव्य भी कहते हैं।  चित्र काव्य - व्यंग्य से रहित काव्य चित्र काव्य होता है, इसे अधम काव्य भी कहा जाता है।       प्रसिद्ध ध्वनिवादी आचार्य मम्मट ने अपने 'काव्य प्रकाश' में गुणीभूत व्यंग्य काव्य का जो लक्षण प्रस्तुत किया है, उसका अनुवाद निम्न प्रकार है -       जहाँ पर वाच्यार्य विवक्षित होता हुआ भी व्यंग्यनिष्ठ होता है, वहां विवक्षित वाच्य ध्वनि नामक द्वितीय भेद होता है। यह विवक्षित वाच्य ध्वनि एक असंलक्ष्य क्रम व्यंग्य और दूसरा लक्ष्य व्यंग्य होता है। अलक्ष्य पद से सूचित होता है कि विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव ...

काव्य के भेद 'चित्रकाव्य' का परिचय दीजिए।

प्रश्न 14. काव्य के भेद 'चित्रकाव्य' का परिचय दीजिए। चित्रकाव्य उत्तर- आचार्य मम्मट ने चित्रकाव्य को अधमकाव्य स्वीकार किया है। चित्रकाव्य के विषय में मम्मट का कवन निम्न प्रकार है -  शब्दार्थ चित्रं यत्पूर्वं काव्यद्वय मुदाहृतम।  गुण प्रधान्या तस्यत्र स्थितिश्चिरार्थ शब्दयोः।।      ( शब्द चित्र और अर्थ चित्र नामक दो प्रकार के जो काव्य पहले कहे गये हैं, उनमें शब्द चित्र ओर अर्थ चित्र की स्थिति गुण की प्रधानता के कारण होती है।)      ऐसा भी नहीं है कि शब्द-चित्र में अर्थ का अभाव और अर्थ चित्र में शब्द का अभाव होता है। आचार्य मम्मट ने शब्द चित्र और अर्थ चित्र के उदाहरण इस प्रकार दिये हैं - शब्द चित्र -  प्रथम चरणच्छायस्तेवत् ततः कनक प्रभः,  तदनु विरहोत्ताम्पत्तन्त्री कपोलवल ड्यूटी तिः।।  उदयति ततो ध्वन्त ध्वसक्षमः क्षणदा मुखे,  सरस विसिनी कन्दच्छंदच्छवि भृंग लाञ्छनः।। यत्पूर्व काव्यद्वय मुदाहृतम्। गुण प्रधान्या तस्यत्र स्थितिश्विरार्थ शब्दयोः ।। अर्थ चित्र - ते द्रष्टिमात्र पतिता अपनाम कस्य,  शोभाय पक्ष्मल दशामलकाः खलाश...

वक्रोक्ति एवं अभिव्यंजनावाद का अन्तर स्पष्ट कीजिए।

  प्रश्न 9. वक्रोक्ति एवं अभिव्यंजनावाद का अन्तर स्पष्ट कीजिए।   वक्रोक्ति एवं अभिव्यंजनावाद में अन्तर उत्तर- वक्रोक्ति सम्प्रदाय की स्थापना करने वाले आचार्य कुन्तक ने 'वक्रोक्ति काव्य जीवित' नामक ग्रंथ की रचना करके वक्रोक्ति को काव्य की आत्मा माना है। आचार्य कुल्तक की वक्रोक्ति अपने आप में रस, ध्वनि तथा औदित्य इन तीनों को आप में समेटे हुए है। आचार्य कुन्तक के अनुसार कवि की रचना चातुर्य से सुशोभित विचित्र उक्ति कही जाती है।      हिन्दी में अभिव्यंजना शब्द का प्रयोग अंग्रेजी के 'एक्सप्रेशन' (Expression) शब्द के स्थान पर किया जाता है। यह सिद्धांत अंग्रेजी के प्रसिद्ध आलोचक क्रोचे का है। क्रोचे ने दो प्रकार का ज्ञान माना है - प्रतिभा ज्ञान और प्रत्यक्ष ज्ञान। कोचे प्रत्यक्ष दर्शन को भी प्रतिभा ज्ञान मानता है। प्रत्यक्षानुभूति में वास्तविकता और अवास्तविकता के अन्तर का ज्ञान रहता है। इसमें देश काल का ज्ञान रहता है, किन्तु प्रतिभा ज्ञान में इस प्रकार का भेद नहीं रहता ।  आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अभिव्यंजनावाद को भारतीय वक्रोक्ति का विलायती संस्करण कहा है। आच...

ध्वनि सिद्धांत के स्वरूप का वर्णन कीजिए।

  प्रश्न 10. ध्वनि सिद्धांत के स्वरूप का वर्णन कीजिए।   ध्वनि सिद्धांत के स्वरूप उत्तर- भारतीय आचार्य आनन्दवर्द्धन ने ध्वनि को काव्य की आत्मा घोषित किया है। भरतमुनि, भामह, दण्डी और वामन ने भी ध्वनि को मान्यता प्रदान की है। इनमें से किसी ने भी ध्वनि को काव्य की आत्मा नहीं कहा है। अलंकारवादी आचार्य भामह ने उक्ति वैचित्र्य को काव्य का जीवनाधायक तत्व माना है। आचार्य भामह ने वक्रोक्त्ति की परिभाषा करते हुए कहा है 'शब्द और अर्थ की विलक्षणता ही वक्रोक्ति है।' किसी बात को घुमा-फिरा कर कहने से कथन में वक्रता आ जाती है। आचार्य अभिनवगुप्त ने वक्रोक्ति को परिभाषित करते हुए कहा है -  प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम्। यत्तत् प्रसिद्धावयवातिरेक्तं विभातिलावण्य मिवांगनासु।। (जिस प्रकार नायिका के मुख, नाक, कान आदि अनेक अवयव होते हैं, किन्तु लावण्य का कोई अवयव नहीं होता। फिर भी वह सभी अवयवों से स्फुटित होने वाला प्रधान तत्व है। इसी प्रकार प्रतीयमान अर्थ किसी शब्द का उद्वेलित अर्थ नहीं होता, किन्तु सभी शब्दों के संकेत से स्फुटित होता है।)  आचार्य आनन्दव...

ध्वनि सिद्धांत की प्रमुख स्थापनाओं पर प्रकाश डालिए।

  प्रश्न 11. ध्वनि सिद्धांत की प्रमुख स्थापनाओं पर प्रकाश डालिए।     ध्वनि सिद्धांत की प्रमुख स्थापनाएं उत्तर- ध्वनि सिद्धांत की निम्नलिखित स्थापनाएं हैं- आनन्दवर्धन के पूर्व अनेक आचायों द्वारा ध्वनि को काव्य की आत्मा घोषित करना - आनन्दवर्धन ने स्पष्ट शब्दों में अपने 'ध्वन्यालोक' में कहा है कि अनेक पूर्ववर्ती आचार्य ध्वनि को काव्य की आत्मा मानते रहे हैं। न तो आनन्दवर्धन ने किसी आचार्य का नाम लिया और न इस प्रकार का कोई ग्रन्थ प्राप्त होता है।  बारह विप्रतिपत्तियों की स्वीकृति और खण्डन - अलंकार सर्वस्व की टीका में जयरथ ने ध्वनि के विरोधियों द्वारा माने गये 12 दोष प्रस्तुत किये है। आनन्दवर्धन ने इन सभी का खण्डन किया है। ध्वनि का अभाव मानने वालो के तीन विकल्प - ध्वनिकार आनन्दवर्धन ने उन लोगों के तीन विकल्प बताये है जो बनी हुयी ध्वनि का अभाव मानते हैं।  उपनिषद बनी हुई – आचार्य आनन्दवर्धन ने ध्वनि को सभी श्रेष्ठ कवियों का उपनिषद अर्थात् धर्मग्रन्थ बताया है। मन में आनन्द की प्रतिष्ठा का कारण - आनन्दवर्धन ने ध्वनि को मन में आनन्द की प्रतिष्ठा करने वाला ला म...

रीति सिद्धांत की प्रमुख स्थापनाओं पर प्रकाश डालिए।

प्रश्न 6. रीति सिद्धांत की प्रमुख स्थापनाओं पर प्रकाश डालिए। रीति सिद्धांत की प्रमुख स्थापनाएँ उत्तर - रीति सिद्धांत की अनेक आचार्यों ने अपनी-अपनी मान्यता के अनुसार भिन्न-भिन्न स्थापनाएँ की हैं - रीति सिद्धांत की पहली स्थापना काव्य की आत्मा के रूप में आचार्य वामन ने करते हुए लिखा है - रीतिरात्मा काव्यस्य।  रीति संबंधी दूसरी स्थापना आचार्य वामन ने की है। इन्होने रीति का गुणों के साथ संबंध स्वीकार किया है।  आचार्य वामन ने रीति के तीन भेद - वैदर्भी, गौड़ी और पांचाली करके तीसरी स्थापना की है। रीति सिद्धांत की चौथी स्थापना रीति सिद्धांत का नाम गुण सिद्धांत करना है। ये स्थापना भी आचार्य वामन ने की है। रीति-सम्बन्धी पांचवी स्थापना रीतियों में गुणों की है। भरतमुनि ने शब्द के जो देश गुण बताए हैं, उनका समावेश आचार्य दंडी ने शब्द के तीन गुणों में किया है। आचार्य वामन ने 'समग्रगुणोपेता वैदर्भी' लिखकर रीति सिद्धांत में पांचवी स्थापना की है। आचार्य वामन ने पांचाली रीति को माधुर्य और सुकुमारता दो गुणों वाली बताया है। आचार्य वामन से पहले वैदर्भी और गौड़ी दो रीतियाँ मानी जाती हैं। आचार्य व...

वक्रोक्ति के भेदों पर प्रकाश डालिए।

  प्रश्न 8. वक्रोक्ति के भेदों पर प्रकाश डालिए।    वक्रोक्ति के भेद उत्तर- वक्रोक्ति को अलंकार मानने वाले सबसे पहले आचार्य भामह हैं। उन्होंने इसे अतिशयोक्ति का पर्याय माना है। आचार्य भामह ने वक्रोक्ति को काव्य की आत्मा न कहकर काव्य का जीवनाचायक तत्व माना है। जीवनाधायक तत्व का अर्थ लगभग आत्मा ही है।  वक्रोक्ति को काव्य की आत्मा मानने वाले आचार्य कुन्तक ने इसके निम्नलिखित छ भेद किये हैं -  वर्ण वक्रता - यहाँ आचार्य कुन्तक का वर्ण से अभिप्राय प्राण-व्यंजना से है। एक-दो या अधिक वर्णों का बार-बार प्रयोग वर्ण वक्रता है।  पद-पूर्वार्द्ध वक्रता - शब्द या पद के आरम्भ में उत्पन्न वक्रता पद-पूर्वार्द्ध वक्रता कहलाती है। आचार्य कुन्तक ने इसके भी आठ भेद किये हैं। पद-परार्द्ध वक्रता - जिस वक्रता का सम्बन्ध पद या शब्द के बाद वाले भाग से होता है, उसे पद-परार्द्ध वक्रता कहते हैं। वाक्य वक्रता - जहाँ वक्रता का आधार पूरा वाक्य होता है, वहां वाक्य वक्रता मानी जाती है।  प्रकरण वक्रता - इसका तात्पर्य प्रसंग सम्बन्धी वक्रता से है। आचार्य कुंतक ने इसके भी चार ...

वक्रोक्ति सिद्धांत की अवधारणा पर प्रकाश डालिए।

 प्रश्न 7. वक्रोक्ति सिद्धांत की अवधारणा पर प्रकाश डालिए।   वक्रोक्ति सिद्धांत की अवधारणा उत्तर- वक्रोक्ति शब्द का सामान्य अर्थ टेढ़ा अथवा आस्वाभाविक कथन है। संस्कृत साहित्य में वक्रोक्ति शब्द वाक् छल, क्रीड़ा-कलाप तथा हास-परिहास के अर्थ में भी प्रयोग किया जाता है। आचार्य कुन्तक ने वक्रोक्ति को काव्य की आत्मा माना है। इससे पूर्व किसी आचार्य ने वक्रोक्ति की चर्चा नहीं की है। आचार्य कुन्तक के अनुसार वैदग्ध्यभंगीभणिति अर्थात् चतुर कवि का कर्म कुशलता से कथन है। उन्होंने वक्रोक्ति को अलंकार अर्थात् शोभा बढाने वाला माना है। आचार्य कुन्तक ने वक्रोक्ति के छः वेद माने हैं - (1) वर्णविन्यास वक्रता, (2) पद-पूर्वार्द्ध वक्रता, (3) पद-परार्द्ध वक्रता, (4) वाक्य वक्रता, (5) प्रकरण वक्रता, (6) प्रबंध वक्रता।  वक्रोक्ति का इतिहास अथर्ववेद से आरम्भ होता है। आचार्य भामह ने अपने काव्यालंकार में अलंकार को काव्य का सर्वस्व मानते हुए वक्रोक्ति को काव्य का प्राण माना है। आचार्य दण्डी ने काव्य को स्वभावोक्ति और वक्रोक्ति दो भागों में बांटा है। आचार्य रुद्रट ने वक्रोक्ति को शब्दा...

भारतीय काव्यशास्त्र के अनुसार रीति एवं शैली के संबंध पर प्रकाश डालिए।

प्रश्न 5 . भारतीय काव्यशास्त्र के अनुसार रीति एवं शैली के संबंध पर प्रकाश डालिए।    रीति एवं शैली के संबंध उत्तर - भारतीय काव्यशास्त्र में आचार्य वामन ने रीति सम्प्रदाय की स्थापना करके रीति को काव्य की आत्मा कहा है। संस्कृत साहित्य में रीति शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया गया है। रीति शब्द का पहली बार प्रयोग स्तुति के अर्थ में ऋंगवेद में पाया जाता है : जैसे -  महीव रीति: महती स्तुतिरिव।    अग्निपुराण ने रीति वक्तृत्व कला को रीति माना है।  बाणभट्ट ने रीति को रचना शैली माना है।  आचार्य भामह ने रीति शब्द का प्रयोग काव्य के अर्थ में किया है।  आचार्य वामन से हिंदी साहित्य तक रीति का अनेक और भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयोग प्राप्त होता है।  शैली के अर्थ में रीति शब्द का प्रयोग सबसे पहले पतंजली ने अपने 'महाभाष्य' में किया है।उन्होंने 'एषा ह्याचार्यस्य शैली' में लिखा है, जिसका अर्थ है - यह आचार्य की शैली अर्थात कथन का ढंग है।  वेदों के संहिता काल के बाद ब्राम्हण काल में रीति ने अर्थात लेखन शैली ने गद्य का नवीन रूप धारण कर लिया। काव्यशास्...