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Showing posts from August, 2024

चन्दबरदायी : पृथ्वीराज रासो (पद्मावती समय) लघु उत्तरीय प्रश्न

  एम. ए. हिंदी साहित्य ( प्रथम सेमेस्टर ) प्राचीन एवं मध्यकालीन काव्य (द्वितीय प्रश्न-पत्र) इकाई-1. चन्दबरदायी : पृथ्वीराज रासो (पद्मावती समय) लघु उत्तरीय प्रश्न -  प्रश्न 1. पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता पर प्रकाश डालिए। प्रश्न 2. प‌द्मावती समय का काव्यगत सौन्दर्य बताइए। प्रश्न 3.  पृथ्वीराज रासो का सामान्य परिचय दीजिए। Chandravardai Prithviraj raso laghu uttariy prashn. अन्य महत्वपूर्ण लिंक ★ चंद्रवरदाई पृथ्वीराज रासो पद्मावती समय अति लघु उत्तरीय प्रश्न ★ चंद्रवरदाई पृथ्वीराज रासो पद्मावती समय लघु उत्तरीय प्रश्न ★ चंद्रवरदाई पृथ्वीराज रासो पद्मावती समय दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

पृथ्वीराज रासो का सामान्य परिचय दीजिए

  एम. ए. हिंदी साहित्य ( प्रथम सेमेस्टर ) प्राचीन एवं मध्यकालीन काव्य (द्वितीय प्रश्न-पत्र) इकाई-1. चन्दबरदायी : पृथ्वीराज रासो (पद्मावती समय) लघु उत्तरीय प्रश्न -  प्रश्न 3. पृथ्वीराज रासो का सामान्य परिचय दीजिए। उत्तर - पृथ्वीराज रासो हिन्दी साहित्य का प्रथम वृहद महाकाव्य और अमरकीर्ति स्तम्भ है जिसकी रखना चन्दवरदाई ने की थी। पृथ्वीराज रासो 2500 पृष्ठों का बड़ा ग्रन्थ है जिसमें 69 सर्ग हैं। इसमें मुख्य रूप से दिल्ली के सम्राट् पृथ्वीराज चौहान की कथा है। पृथ्वीराज के जीवन की वीरगाथाओं का इसमें सजीव वर्णन किया गया है। काव्य-शैली की दृष्टि से यह एक रासक काव्य है। कल्पना और इतिहास का इसमें अच्छा सम्मिश्रण हुआ है। पृथ्वीराज चौहान के चरित्र पर आधारित होने से यह एक चरित-काव्य है जिसका नायक पृथ्वीराज चौहान है। रासो की मुख्य कथा को निम्न बिन्दुओं में बाँटा जा सकता है- पृथ्वीराज चौहान का सलक पुत्री इच्छिनी के साथ विवाह। पृथ्वीराज चौहान का शशिव्रता के साथ विवाह। पृथ्वीशाह चौहान का जयचन्द की पुत्री संयोगिता के साथ विवाह। कयमास वध। पृथ्वीराज-जयचन्द युद्ध। पृथ्वीराज-शाहबुद्दीन युद्ध। ...

प‌द्मावती समय का काव्यगत सौन्दर्य बताइए।

एम. ए. हिंदी साहित्य ( प्रथम सेमेस्टर ) प्राचीन एवं मध्यकालीन काव्य (द्वितीय प्रश्न-पत्र) इकाई-1. चन्दबरदायी : पृथ्वीराज रासो (पद्मावती समय) लघु उत्तरीय प्रश्न -  प्रश्न 2. प‌द्मावती समय का काव्यगत सौन्दर्य बताइए। प‌द्मावती समय का काव्यगत सौन्दर्य उत्तर-'पद्‌‌मावती समय' के काव्य-सौन्दर्य का उ‌द्घाटन भावपक्ष एवं कलापक्ष की विशेषताओं के आधार पर किया जा सकता है- भाव पक्ष की विशेषताएँ - 'पद्‌मावती समय' रासो का बीसवाँ अध्याय है जिसमें रासो के नायक दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान और समुद्रशिखर के राजा विजयपाल की पुत्री राजकुमारी पद्‌मावती के विवाह का वर्णन किया गया है। 'प‌द्मावती समय' स्वयं में एक पूर्ण कथात्मक काव्य है। इसकी कथा इतिवृत्तात्मक है, परन्तु अनुभूतिपूर्ण मार्मिक स्थलों के वर्णन से समस्त कथानक रसात्मक बन गया है। 'प‌द्मावती समय' श्रृंगार रस-प्रधान काव्य है। इसका प्रारम्भ और अन्त श्रृंगार रस से होता है किन्तु यदि प्रधान रस की दृष्टि से देखा जाए तो इस सर्ग में वीर रस का भी सुन्दर परिपाक हुआ है। श्रृंगार रस का एक उदाहरण द्रष्टव्य है- "कुटिल केश सुदेश,...

पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता पर प्रकाश डालिए।

एम. ए. हिंदी साहित्य ( प्रथम सेमेस्टर ) प्राचीन एवं मध्यकालीन काव्य (द्वितीय प्रश्न-पत्र) इकाई-1. चन्दबरदायी : पृथ्वीराज रासो (पद्मावती समय) लघु उत्तरीय प्रश्न -  प्रश्न 1. पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता पर प्रकाश डालिए। पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता पर प्रकाश उत्तर - आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने पृथ्वीराज रासो को हिन्दी का प्रथम महाकाव्य माना है जिसकी रचना पृथ्वीराज चौहान के अभिन्न मित्र एवं दरबारी कवि चन्दवरदाई द्वारा की गई है। यह 2500 पृष्ठों एवं 69 सर्गों का विशालकाय ग्रन्थ है। रासो की प्रामाणिकता के विषय में पर्याप्त विवाद रहा है। विद्वानों का एक वर्ग इसे पूर्णतः अप्रमाणिक रचना स्वीकार करता है। इस वर्ग के विद्वानों में प्रमुख है - आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, मुंशी देवी प्रसाद, डॉ. बूलर तथा गौरीशंकर हीरानन्द ओझा आदि। दूसरे वर्ग में वे विद्वान् हैं जो रासो को एक प्रामाणिक रचना मानते हैं। इस वर्ग में डॉ. श्यामसुन्दरदास, मिश्र बन्धु तथा कर्नल टाड आदि के नाम लिये जाते हैं। तृतीय वर्ग के विद्वान् रासो को अर्द्ध-प्रामाणिक रचना मानते हुए इसके कुछ अंश को ही प्रामाणिक मानते हैं। आचार्य हजारीप्र...

उलटबांसी किसकी रचना है?

उलटबांसी मुख्य रूप से कबीरदास की रचनाओं में मिलने वाला एक अलंकार है कह सकते हैं कि विचार प्रस्तुत करने का एक अनूठा तरीका है।   क्या होती है उलटबांसी?  उलटबांसी में कबीरदास जी सामान्य बातों को उलट-पलट कर एक नया अर्थ निकालते हैं। वे समाज में प्रचलित रूढ़ियों, धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक व्यवस्था पर व्यंग्य करते हुए अपनी बात को स्पष्ट करते हैं।   उदाहरण के लिए:  "पंडित बड़ा भला, मुर्ख को डराता।" "मंदिर मस्जिद तो देखी, आदमी को ना देखा।"   इन पंक्तियों में कबीरदास जी ने धार्मिक पाखंड और दिखावे पर तंज कसा है।   क्यों प्रसिद्ध हैं उलटबांसियां? कबीरदास की उलटबांसियां इसलिए प्रसिद्ध हैं क्योंकि:  सरल भाषा: वे अपनी बात को बहुत ही सरल भाषा में कहते हैं, जिससे आम लोग भी उन्हें आसानी से समझ सकते हैं।  गहरा अर्थ: उनकी बातों में एक गहरा अर्थ छिपा होता है, जिसे सोचने पर ही समझा जा सकता है।  समाजिक चेतना: वे समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ खड़े होते हैं और लोगों को जागरूक करते हैं।  अन्य संतों का योगदान: हालांकि कबीरदास को उलटबांस...

कबीर के प्रथम पद में कौन सा रस है?

कबीर के प्रथम पद में कौन सा रस है, यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका सीधा उत्तर देना थोड़ा मुश्किल है।   क्योंकि:  ◆ कबीर दास की कविता में विभिन्न रसों का सम्मिश्रण होता है।  ◆ प्रथम पद कौन सा है, इस पर विद्वानों के अलग-अलग मत हो सकते हैं।  * रस का निर्धारण पाठक की संवेदना और व्याख्या पर भी निर्भर करता है।    हालांकि, सामान्यतः कबीर की कविता में भक्ति रस प्रमुख रूप से देखा जाता है।  उनके पदों में भगवान के प्रति प्रेम, निष्ठा और समर्पण का भाव स्पष्ट रूप से झलकता है।   यदि आप कोई विशेष पद बता सकें, तो मैं आपको उसका अधिक सटीक विश्लेषण कर सकता हूँ। कबीर दास की कविता में अन्य रसों की झलक: ● शांत रस: जीवन की निरर्थकता और मोक्ष प्राप्ति की बातें  ● वीर रस: सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ाई  ● करुण रस: मानव दुखों और सामाजिक असमानता पर सहानुभूति  ● हास्य रस: व्यंग्य और हास्य के माध्यम से सामाजिक बुराइयों पर प्रहार  आप किस विशेष पद के बारे में जानना चाहते हैं?  यदि आप कबीर दास की कविता के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं तो आप...

कबीर की उलटबांसी अर्थ सहित?

कबीर की उलटबांसी कबीर दास की उलटबांसियां उनकी कविता की सबसे अनूठी विशेषताओं में से एक हैं। ये ऐसे वाक्य होते हैं, जिनमें शब्दों का सीधा अर्थ उलटा होता हुआ प्रतीत होता है। ये वाक्य गहरे दार्शनिक अर्थों को व्यक्त करते हैं और पाठक को सोचने पर मजबूर करते हैं।  उलटबांसियों का महत्व:  ◆ रहस्यमयता : ये वाक्य एक रहस्यमय आभा पैदा करते हैं, जो पाठक को बार-बार इनके अर्थ को खोजने के लिए प्रेरित करती है।  ◆ दार्शनिक गहराई: इनमें जीवन के गूढ़ सत्यों को सरल भाषा में व्यक्त किया जाता है।  ◆ सामाजिक व्यंग्य: कई बार ये वाक्य समाज की कुरीतियों पर व्यंग्य करते हुए एक नया दृष्टिकोण पेश करते हैं।  कुछ उदाहरण और उनके अर्थ: ● आँगन सूखा, घर में पानी: इसका अर्थ है कि बाहरी दिखावा और अंदरूनी खोखलापन। व्यक्ति बाहर से धार्मिक दिखता हो, लेकिन अंदर से वह पापी हो सकता है।   ● मछली जल की प्यासी: इसका अर्थ है कि व्यक्ति को अपनी ही जरूरतों का एहसास नहीं होता। मछली पानी में रहती है, फिर भी उसे प्यास लगती है, यह मूर्खता का प्रतीक है । ● धरती उलटि अकासै जाय, चिउंटी के मुख हस्ति समाय: इसका ...

कबीर दास किस रस के कवि हैं?

कबीर दास मुख्यतः श्रृंगार रस से हटकर अन्य रसों के कवि माने जाते हैं।  कबीर दास की कविता में मुख्य रूप से शांत, वीर और भक्ति रस की झलक मिलती है।  ◆ शांत रस: कबीर दास ने अपने दोहों में जीवन की निरर्थकता और मोक्ष प्राप्ति की बात को बहुत ही शांत भाव से व्यक्त किया है।  ◆ वीर रस: उन्होंने सामाजिक बुराइयों के खिलाफ अपने शब्दों से युद्ध किया है।  ◆ भक्ति रस: कबीर दास की कविता में भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति भाव भी प्रबल रूप से दिखाई देता है।  क्यों नहीं श्रृंगार रस?  कबीर दास ने भौतिक सुखों और कामुकता को त्यागकर आध्यात्मिक जीवन को अपनाया। उनकी कविता में व्यक्तिगत प्रेम की बजाय ईश्वर प्रेम अधिक महत्वपूर्ण है।   अन्य रसों का प्रभाव:   ●  करुण रस : कबीर दास ने सामाजिक असमानता और मानव दुखों को देखकर करुण रस का भी प्रयोग किया है।  ● हास्य रस : कबीर दास ने व्यंग्य और हास्य के माध्यम से सामाजिक बुराइयों पर प्रहार किया है।   ★  निष्कर्ष : कबीर दास की कविता में विभिन्न रसों का समन्वय है, लेकिन मुख्य रूप से शांत, वीर और भक्...

शैली विज्ञान के स्वरूप का निर्धारण करते हुए उसकी विशेषताओं का उल्लेख कीजिए

शैली विज्ञान के स्वरों का निर्धारण करते हुए उसकी विशेषताओं का उल्लेख कीजिए शैली विज्ञान साहित्य में अनेक प्रकार के आलोचना पद्धति विकसित हुए हैं जिनमें सिद्धांत और प्रभाव दोनों का सम्मिश्रण रहा है। इस कारण प्राय है यह देखने में आया है कि किसी कृति को पढ़कर कोई पाठक या आलोचक रस मगना हो सकता है तो दूसरा इसमें दिमाग ना होने के बजाय उसे निकृष्ट भी मान सकता है क्योंकि वह कृति उस पर इतना प्रभाव नहीं डालते जितना वहां पहले पाठक पर डालती है। यहां तथ्य यह स्पष्ट करता है कि आलोचना के जो आधार बनाए गए उनको सर्वमान्य स्वीकृति नहीं मिल सकती। अतः प्रश्न यहां कोहरा के क्या कोई ऐसी पद्धति जो सर्वमान्य और वैज्ञानिकों तथा जो मात्र प्रीति का ही विश्लेषण करें संभव हो सकती है शैली विज्ञान इसी प्रश्न का समाधान करता है। आलोचना की वैज्ञानिकता डॉक्टर रविंद्र नाथ श्रीवास्तव शैली विज्ञान और आलोचना की नई भूमिका ने लिखा है आलोचना स्वयं में अनुशासन है वह एक टेक्निक है जो अपनी सिद्धि के लिए एक निश्चित कार्य प्रणाली का विकास करती है। वस्तुतः आलोचना को वैज्ञानिक बनाने का अर्थ इस कार्यप्रणाली को वैज्ञानिक बनाना है अतः जब ...

विप्रलम्भ श्रृंगार रस: एक विस्तृत विवेचन by KHILAWAN

विप्रलम्भ श्रृंगार रस हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह श्रृंगार रस का एक प्रकार है जिसमें नायक और नायिका के मिलन की अभिलाषा और उसका पूरा न होना दर्शाया जाता है। यह रस प्रेमियों के विरह के दर्द, उनके मनोदशा और उनके आंतरिक संघर्ष को बड़ी ही मार्मिकता से व्यक्त करता है।  विप्रलम्भ श्रृंगार रस की परिभाषा  भोजराज के अनुसार , "जहाँ रति नामक भाव प्रकर्ष को प्राप्त करे, लेकिन अभीष्ट को न पा सके, वहाँ विप्रर्लभ-श्रृंगार कहा जाता है।"  भानुदत्त के अनुसार , "युवा और युवती की परस्पर मुदित पंचेन्द्रियों के पारस्परिक सम्बन्ध का अभाव अथवा अभीष्ट अप्राप्ति विप्रलम्भ है।"  सरल शब्दों में कहें तो - विप्रलम्भ श्रृंगार में प्रेमी और प्रेमिका के मिलन की इच्छा तो होती है लेकिन वे एक-दूसरे से दूर रहते हैं, जिससे उनके मन में विरह की पीड़ा उत्पन्न होती है।  विप्रलम्भ श्रृंगार रस के लक्षण   विरह : प्रेमी और प्रेमिका का एक-दूसरे से अलग होना।  व्यथा : विरह के कारण उत्पन्न होने वाला मानसिक कष्ट। आकांक्षा : प्रियतम को पाने की तीव्र इच्छा।  विलाप : विरह के कारण होन...

कबीर की साखियाँ हिंदी साहित्य में रखती हैं एक अलग पहचान

Kabir ki sakhiyan with meaning in hindi भक्ति भजन हरि नाव है, दूजा दुक्ख अपार।  मनसा, वाचा, करमना, कबीर सुमिरन सार।।1।। सन्दर्भ - प्रस्तुत साखी "कबीर की साखियां" पाठ से उद्धृत की गई है। इसके कवि संत कबीर हैं। प्रसंग - कवि ने ईश्वर भक्ति के महत्व को बताया है। व्याख्या - कबीर दास जी कहते हैं कि ईश्वर भक्ति नाव के समान है, जिसमें बैठकर संसार रूपी सागर को पार किया जा सकता है। ईश्वर के अतिरिक्त समस्त संसारिक साधन अपार दु:ख को देने वाले हैं। माया-मोह के बंधनों में पड़कर मनुष्य को सिवाय दु:ख के कुछ भी प्राप्त नहीं होता है अतः मनुष्य को मन, वचन और कर्म से ईश्वर का स्मरण करना चाहिए। यही भगवत प्राप्ति का साधन है। काव्य सौंदर्य - 1. भवसागर से मुक्ति भगवद भक्ति के ही द्वारा प्राप्त हो सकती है, 2. सधुक्क्ड़ी भाषा का प्रयोग किया है, 3. दोहा छंद में कबीर ने अपनी साखियों की रचना की है, 4. शांत रस, अनुप्रास अलंकार, 5. माधुर्य गुण। जो तोको कांटा बुवै, ताहि बोय तू फूल। तू ही फूल को फूल है वाको है त्रिशूल।।2।। संदर्भ - पूर्ववत।  प्रसंग - परोपकार के महत्व को दर्शाया है। व्या...