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Showing posts from August, 2022

मार्क्सवाद का परिचय दीजिए।

प्रश्न 8. मार्क्सवाद का परिचय दीजिए।   उत्तर - कार्ल मार्क्स के भौतिकवादी दृष्टिकोण को मार्क्सवाद कहा जाता है। इसका दूसरा नाम ' समाजवाद ' भी है। कार्ल मार्क्स ने साहित्य की व्याख्या भी भौतिकवादी दृष्टिकोण से की उसने साहित्य में समाज और मानव का यथार्थ रूप प्रस्तुत करने का भी आग्रह किया। समाजवाद का मूल आधार वर्ग संघर्ष है। मार्क्स ने सभी आदर्शवादी वृत्तियों का विरोध किया। उसने इन वृत्तियों को भटकाव बताया। मार्क्स ने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद को दार्शनिक दृष्टिकोण घोषित किया। मार्क्स के चिन्तन का आधार लोकमंगल और उपयोगितावाद है। मार्क्स का भौतिकवाद आनन्दवादी दर्शन का विरोधी है। मार्क्स की विचारधारा द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और वर्ग संघर्ष पर आधारित है। मार्क्स की विचारधारा को साहित्य के परिप्रेक्ष्य में काडवेल ने प्रस्तुत किया। उसने आर्थिक व्यवस्था को समाज के जीवन का आधार माना साहित्य समाज के जीवन से प्रभावित होता है, इसी आधार पर साहित्य को समाज का दर्पण माना जाता है। हिन्दी साहित्य में समाजवाद अथवा मार्क्सवाद को प्रगतिवाद कहा गया। markswad ka parichay dijiye.  marksvad ki paribhas...

यूरोपीय साहित्य के अभिव्यंजनावाद पर प्रकाश डालिए।

प्रश्न 7. यूरोपीय साहित्य के अभिव्यंजनावाद पर प्रकाश डालिए।  उत्तर - अभिव्यंजनावाद की स्थापना इटली के दार्शनिक क्रोचे ने की। हिन्दी का अभिव्यंजना शब्द अंग्रेजी के ' रोमाण्टिसिज्म ' का अनुवाद है। इस विचारधारा को जर्मनी के लेसिंग, विकलमेन और गेटे ने बल दिया। लेसिंग का सिद्धान्त सौन्दर्य सिद्धान्त कहलाता है। विकेलमेन ने सौन्दर्य को आगे बढ़ाकर कला में अभिव्यंजना अर्थात् अभिव्यक्त्ति को आवश्यक बताया।  अभिव्यंजनावाद एक कला सिद्धान्त है। किसी कलाकृति के समग्र प्रभाव को हमारी आत्मा जब विशुद्ध रूप में अपनी क्षमता के अनुसार ग्रहण करती है और उसे उसी रूप में प्रकट करती है, यही अभिव्यंजनावाद है। अभिव्यंजना के दो रूप हो सकते हैं - (क) अन्तः संस्कार अथवा आत्म-संवेदना - इसका तात्पर्य किसी कलाकृति को देखकर मन पर पड़ने वाले प्रभाव से है।  (ख) अभिव्यंजना को स्वयं प्रकाश ज्ञान और सौन्दर्य भी कहा गया है।  क्रोचे ने अभिव्यंजना को ही कला माना है। उसके अनुसार स्वयं प्रकाश ज्ञान सहज अनुभूति है।  Europiya sahitya ke abhivyanjanavad par prakash daliye.

अंग्रेजी साहित्य के स्वच्छंदतावाद का परिचय दीजिए।

प्रश्न 6. अंग्रेजी साहित्य के स्वच्छंदतावाद का परिचय दीजिए।  उत्तर - अठारहवीं शताब्दी के अन्तिम दशक के बाद और बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में जो साहित्यिक विचारधारा उत्पन्न हुयी, रोमाण्टिसिज्म कहा गया। इसी का हिन्दी अनुवाद 'स्वच्छंदतावाद' है। यूरोप में इस स्वच्छंद्रविचारधारा का झंडा रूसो ने उठाया। इसने पहली बार मानव की स्वतंत्रता पर बल दिया। उसने स्वतंत्रता के लिए प्रकृति की ओर लौटने का समर्थन किया। अभिजात्यवाद में आत्मा को अधिक दबाया गया था। इसके कारण यूरोपीय साहित्य में स्वाभाविक उन्मेष दब गया था। स्वच्छंदतावाद को नव्यशास्त्रवाद भी कहा गया। स्वच्छंदतावाद की उत्पत्ति के निम्नलिखित कारण थे - (क) सामाजिक, (ख) राजनीतिक, (ग) दार्शनिक और (घ) साहित्यिक ।  धीरे-धीरे यह आन्दोलन विश्वव्यापी हो गया। विद्वानों ने इसे निम्नलिखित दो रूपों में ग्रहण किया - (क) शाश्वत तत्व के रूप में - ग्रियर्सन तथा भारतीय विद्वानों ने इसे शाश्वत रूप में ग्रहण किया।  (ख) ऐतिहासिक आन्दोलन के रूप में - इसे इस रूप में लगभग सभी ने स्वीकार किया।   Angreji sahitya ke svachchhandtawad ka parichay dijie...

टी. एस. इलियट के संवेदनशीलता का असाहचर्य को स्पष्ट कीजिए।

प्रश्न 5. टी. एस. इलियट के संवेदनशीलता का असाहचर्य को स्पष्ट कीजिए।  उत्तर - उन्नीसवीं शताब्दी तक अंग्रेजी साहित्य में रोमानी एवं मानवतावादी भावनाओं का अधिक प्रचलन था। बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में इन दोनों का विरोध होने लगा। तभी 'संवेदनशीलता का असाहचर्य है' शब्द प्रचलन में आया। अगर संवेदना और वस्तुनिष्ठता को जोड़ दें तो 'संवेदनशीलता का असाहचर्य बन जाता है।' यह वाक्यांश अंग्रेजी के शब्द-समूह 'डिसएशोसिएसन सेन्सेबिलिटी' का हिन्दी अनुवाद है। अंग्रेजी के इस शब्द-समूह का अनुवाद डॉ. सत्यदेव मिश्र ने 'भाव-बोध वियोजन' में किया है। संवेदनशीलता का सिद्धांत और भाव-बोध का वियोजन दोनों ही वाक्यांश अपरिचित और दुर्बोध है। इलियट का एक निबन्ध संकलन है— सेलेक्टिड एसेज। इसमें एक निबंध है - दी मैटाफिजीकल पोइंट्स। इसी में इलियट ने स्पष्ट किया है कि अंग्रेजी कविता में पहली 'यूनिफिकेशन ऑफ सेन्सेबिलिटी' अर्थात् भाव-बोध का एकीकरण था। इसके विरोध में इलियट ने 'डिसएसोसिएशन ऑफ सेन्सेबिलिटी' शब्द को प्रचलित किया। इसका तात्पर्य किसी रचना का भला या बुरा होना भाव के साहचर्...

टी. एस. इलियट की मान्यता के अनुसार कविता में वस्तुनिष्ठ समीकरण को स्पष्ट कीजिए।

प्रश्न 4. टी. एस. इलियट की मान्यता के अनुसार कविता में वस्तुनिष्ठ समीकरण को स्पष्ट कीजिए।  उत्तर- टी. एस. इलियट ने अपनी आलोचनात्मक सिद्धांतों में विशेष रूप से दो बातें कहीं हैं - निवैयिक्तक प्रज्ञा और वस्तुनिष्ठ समीकरण। वास्तव में निवैयिक्तक प्रज्ञा और वस्तुनिष्ठ समीकरण में विशेष अन्तर नहीं है। इलियट के अनुसार कवि कविता की रचना करते समय व्यक्तिगत भावों या विचारों को प्रकट न करके किसी वस्तु का अलंकारपूर्ण वर्णन करता है। वर्ण्य-वस्तु की कविता में प्रधानता ही वस्तुनिष्ठ समीकरण है। इलियट बाद में कविता में निर्वैक्तिक प्रज्ञा और वस्तुनिष्ठ समीकरण के अभाव का भी समर्थन करने लगे थे, पर उनकी आलोचना में इन दोनों के विचारों की अधिकता है।  इलियट ने वस्तुनिष्ठ समीकरण अपने पूर्ववर्ती विद्वान टी. ई. ह्यूम से प्राप्त किया था। ह्यूम की मान्यता थी कि मनुष्य मूलतः अच्छा होता है, परिस्थितियाँ उसे बुरा बना देती हैं। मनुष्य के बुरे बनने में कुछ नियम और परम्पराएं भी कारण हैं। इस प्रवृत्ति को ह्यूम ने स्वच्छंदतावाद कहा है और इसका विरोध किया है। वह परम्परा और व्यवस्था को ही मनुष्य में अच्छाई उत्पन्न क...

टी. एस. इलियट के निर्वैयक्तिकता के सिद्धांत पर प्रकाश डालिए।

प्रश्न 3. टी. एस. इलियट के निर्वैयक्तिकता के सिद्धांत पर प्रकाश डालिए। उत्तर - निर्वैयक्तिकता के सिद्धांत को अंग्रेजी में 'इम्पर्सनल थ्योरी ऑफ पोयट्री' कहा जाता है। इलियट टी. ई. ह्यूम और एजरा पाउण्ड से बहुत प्रभावित था। कविता में निर्वैयक्तिकता का सिद्धांत एजरा पाउण्ड की सूझ है। एजरा पाउण्ड ने कवि को वैज्ञानिक के समान निर्वैयक्तिक तथा वस्तुनिष्ठ माना है। इलियट के अनुसार काव्य एकाग्रता का प्रतिफल है। इसके अनुसार काव्य की अवधारणा के लिए कवि की एकाग्रता को आवश्यक माना है। कवि अथवा कलाकार अपनी कृति में अपने व्यक्तित्व बोध का तिरस्कार करता है। यही निर्वैयक्तिकता है। कवि और कलाकार का अपने निजी संवेगों पर अंकुश लगाना ही निर्वैयक्तिकता है। इलियट व्यक्तिगत संवेगों पर अंकुश लगाने पर बल देता है। कलाकार और कवि का निस्पृह मस्तिष्क जिस रचना में सक्रिय रहता है, वही श्रेष्ठ होती है। इलियट के अनुसार कला व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति नहीं, अपितु व्यक्तित्व से पलायन है। इलियट के अनुसार कविता अथवा कलात्मक रचना उसकी अचेतावस्था की उपज है। भारतीय आचार्यों का साधारणीकरण और इलियट का निर्वैयक्तिकता का सिद्ध...

टी. एस. इलियट के अनुसार परम्परा की परिकल्पना और वैयक्तिक प्रज्ञा का परिचय दीजिए।

प्रश्न 2. टी. एस. इलियट के अनुसार परम्परा की परिकल्पना और वैयक्तिक प्रज्ञा का परिचय दीजिए।  उत्तर- इलियट ने अपने एक निबन्ध में स्वच्छन्दतावादियों के वैयक्तिक काव्य सिद्धांत का विरोध करते हुए उसे अस्वीकार कर दिया। इसके स्थान पर इलियट ने परम्परा की परिकल्पना की और वैयक्तिक प्रज्ञा को महत्व दिया। परम्परा का अर्थ पहले से चली आती हुयी धारणाओं और मान्यताओं से है। इलियट ने परम्परा के रूप में अपने पूर्ववर्ती टी. ई. ह्यूम एवं एजरा पाउण्ड की मान्यताएँ स्वीकार की ह्यूम ने डारविन के विकासवाद का विरोध किया। विकास का सिद्धांत परम्पराओं का विरोधी है। विकास के सिद्धांत में ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है। ह्यूम ने इसका विरोध करते हुए सृष्टि को ईश्वर की कृपा से सहसा अस्तित्व में आया माना। वैयक्तिक प्रज्ञा की प्रेरणा इलियट को एजरा पाउण्ड से प्राप्त हुयी । एजरा पाउण्ड ने वस्तुनिष्ठता की अभिव्यक्ति को आवश्यक माना। वह कविता में भावावेश वश कही गयी उक्ति को ही काव्य नहीं मानता था। परम्परा के विरोध का ही नाम भावावेश है। इलियट की परम्परा रुढी का पर्याय नहीं है। उसकी परम्परा गत्यात्मक थी। T. S. Eliat ke anus...

मैथ्यू आर्नोल्ड के अनुसार आलोचना का स्वरूप निश्चित करके प्रकार्य का परिचय दीजिए।

प्रश्न 1. मैथ्यू आर्नोल्ड के अनुसार आलोचना का स्वरूप निश्चित करके प्रकार्य का परिचय दीजिए।  उत्तर - मैथ्यू आर्नोल्ड साहित्य को जीव की आलोचना मानता है। उसके अनुसार साहित्य की समस्यायें मानव जीवन की समस्याओं से भिन्न नहीं होती हैं। यह साहित्य का मूल्यांकन जीवन के सन्दर्भ में ही करना चाहता है। मैथ्यू आर्नोल्ड आलोचक में निम्नलिखित तीन गुणों का होना आवश्यक मानते हैं -   (क) आलोचक पढ़े, समझे और वस्तुओं का यथार्थ रूप देखे।  (ख) जो कुछ आलोचक ने सीखा है, उसे वह दूसरों को हस्तान्तरित करें। इस प्रकार अच्छी भावनाएं सभी जगह फैलती हैं।  (ग) आलोचक को रचनात्मक शक्ति के लिए वातावरण तैयार करना चाहिए।    प्रकार्य - इसका तात्पर्य कारयित्री प्रतिभा से है। साहित्य में प्रतिभा दो प्रकार की होती है - कारयित्री और भावयित्री। इन दोनों का अन्तर यह है कि कारयित्री प्रतिभा का कार्य काव्य की रचना करना है और भावयित्री प्रतिभा का कार्य काव्य को समझाना है। इतिहास, विज्ञान आदि में जो वस्तु जैसे है, उसे उसी प्रकार देखना कारयित्री प्रतिभा का काम है। समीक्षा भी कारयित्री प्रतिभा है। Math...

कॉलरिज के कल्पना सिद्धांत का परिचय दीजिए।

प्रश्न 5. कॉलरिज के कल्पना सिद्धांत का परिचय दीजिए।  उत्तर - कॉलरिज यह स्वीकार करता है कि कल्पना निम्नलिखित दो प्रकार की होती है -       (क) आद्य कल्पना - इसे अंग्रेजी में 'प्राइमरी इमेजीनेशन' कहा जाता है। यह कल्पना जीवित और महत्वपूर्ण शक्ति है। इससे हमें मानवीय पदार्थों का बोध होता है। इन्द्रियों द्वारा जिन वस्तुओं का बोध होता है, उन्हें यह कल्पना ही व्यवस्थित करती है। यह कल्पना सहज और स्वाभाविक मानवीय गुण है।       (ख) गौण कल्पना - यह कल्पना विशेष लोगों में प्राप्त होती है। यह कल्पना प्रकृति के पदार्थों में प्राप्त होने वाले अव्यवस्थित स्वरूप को रूप देने वाली शक्ति है।       दोनों कल्पनाओं में अन्तर - पहली अर्थात् आद्य कल्पना प्रकृति या पदार्थों में पाये जाने वाले अव्यवस्थित रूप को निश्चित आकार देती है। यह आन्तरिक शक्ति का अभिप्रेत अर्थात् चाहा हुआ है। तात्पर्य यह है कि इस प्रकार की कल्पना को सभी चाहते हैं। दूसरी कल्पना संयुक्त और आत्मा की कल्पना है। यह आत्मा की ऊर्जा है।       कल्पना का महत्व - कॉल...

लौंजाइनस के अनुसार उदात्त की अवधारणा पर प्रकाश डालिए।

प्रश्न 4. लौंजाइनस के अनुसार उदात्त की अवधारणा पर प्रकाश डालिए।  उत्तर - लौंजाइनस से पहले काव्य को दो रूपों में आंका जाता था - शिक्षा प्रदान करने में सक्षम और आनन्द प्रदान करने वाला। काव्य का भाव तत्व उस समय तक महत्व प्राप्त नहीं कर सका था। लौंजाइनस ने इसी ओर ध्यान दिया।  लौंजाइनस का उदात्त तत्व - लौंजाइनस ने उदात्त तत्व की कोई व्याख्या नहीं की है। उसने उदात्त तत्व को साहित्य के सभी गुणों में महान् माना है। उसने स्वीकार किया है कि उदात्त ऐसा गुण है जो अन्य छोटी-मोटी त्रुटियों में रहते हुए भी साहित्य को सच्चे अर्थों में प्रभावपूर्ण बनाता है। इसके विषय में लौंजाइनस ने कहा है - "अभिव्यक्ति की विशेषता और उत्कर्ष ही औदात्य है। लौंजाइनस ने उदात्त तत्व को काव्य में सर्वोपरि स्थान दिया है। किसी रचना में उदात्त तत्व उपयुक्त तथा महिमापूर्ण शब्द विधान, आवेग को दीप्त करने वाली अलंकार योजना तथा रचना विधान का होना है। कुछ विद्वान यह भी कहते हैं कि लौंजाइनस उदात्त तत्व को काव्य की आत्मा मानता था। साहित्य अपने अध्ययन करने वालों को जिस उच्च एवं आवेगपूर्ण अनुभूति तक ले जाता है, वे ही औदात्य की...

अरस्तू के त्रासदी विवेचन का परिचय दीजिए।

प्रश्न 3. अरस्तू के त्रासदी विवेचन का परिचय दीजिए। उत्तर- संस्कृत के आचार्यों ने काव्य की अपेक्षा नाटक को रमणीय माना है। इसका कारण उसका अभिनय है। भारतीय मान्यता के अनुसार सभी नाटक सुखान्त होने चाहिए। इस प्रकार के नाटकों को अरस्तू ने 'कॉमेडी' (Comedy) कहा है। इसके पर्याय के रूप में हिन्दी में 'कामदी' शब्द का प्रचलन है, जिसका तात्पर्य सुखांत नाटक से है। अरस्तू ने कॉमेडी की अपेक्षा ट्रेजेडी अथवा दुखान्त नाटक को श्रेष्ठ माना है। अरस्तू ने त्रासदी के विषय में जो कहा है, उसका हिन्दी अनुवाद निम्न प्रकार है - " त्रासदी किसी गम्भीर, स्वतः पूर्ण तथा निश्चित आयाम से युक्त कार्य की अनुकृति होती है। उसका माध्यम नाटक के भिन्न-भिन्न भागों में भिन्न-भिन्न रूप में प्रयुक्त सभी प्रकार के आभरणों ( अलंकारों) से अलंकृत भाषा होती है जो समाख्यान अर्थात् वर्णन रूप में न होकर कार्य-व्यापार रूप में होती है। उसमें करुणा तथा त्रास के उद्रेक द्वारा इन मनोविकारों का उचित विरेचन किया जाता है।" अरस्तू ने त्रासदी का प्रयोजन दया तथा भय को जगाने वाली घटनाओं के प्रस्तुतीकरण द्वारा उन भावों ...

अरस्तू के अनुकरण सिद्धांत का परिचय दीजिए।

प्रश्न 2. अरस्तू के अनुकरण सिद्धांत का परिचय दीजिए। उत्तर - अरस्तू के काव्य-सम्बन्धी दो सिद्धांत हैं - अनुकरण सिद्धांत और विरेचन सिद्धांत। अरस्तू के अनुकरण सिद्धान्त का परिचय निम्न प्रकार है - अनुकरण सिद्धान्त का बीजारोपण अरस्तू के गुरु प्लेटो ने किया था। प्लेटो ने मानवीय कला के दो भेद माने हैं -  प्राकृतिक पदार्थ और उनकी प्रतिकृति अर्थात् नकल। प्लेटो ने अनुकरण की अनुकूलता के आधार पर ही काव्य को उत्कृष्ट माना है। वह देखना चाहता है कि काव्य में मूल वस्तु का अनुकरण किस सीमा तक हुआ है। दूसरी बात उस वस्तु का शुभ और अशुभ होना है। प्लेटो ने अनुकरण में भ्रांति, अज्ञान, असावधानी आदि अनेक कठिनाइयाँ मानी हैं। अरस्तू ने अनुकरण का तात्पर्य प्रतिकृति अर्थात नकल न मानकर पुनः सृजन माना है। अरस्तू की दृष्टि में अनुकरण रचनात्मक कार्य भी है। वह साहित्य में अनुकरण को वस्तुपरक अंकन स्वीकार करता है। अरस्तू ने अनुकरण शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया है। वह अनुकरण को वस्तु की टूबहू नकल नहीं मानता। वह अनुकरण को निर्माण प्रक्रिया मानता है। अरस्तू की स्पष्ट धारणा है कि अलंकरण की प्रक्रिया प्रकृति...

प्लेटो के काव्य-सिद्धांतों पर प्रकाश डालिए।

प्रश्न 1. प्लेटो के काव्य-सिद्धांतों पर प्रकाश डालिए। उत्तर- प्लेटो के काव्य-सिद्धांत निम्नलिखित हैं -  काव्य प्रेरणा - प्लेटो ने कविता को अन्तःप्रेरणा की देन अथवा स्वतः प्रसूत भावोद्गार माना है। कवि गंभीर मनन और चिंतन के बाद ही काव्य रचना का आरम्भ मानता है।  अभिव्यक्ति और सत्य - प्लेटो के अनुसार कवि की गंभीर अभिव्यक्ति जब किसी सत्य का उद्घाटन करती है और जब कवि कर्म तर्क की कसौटी पर कसकर किया जाता है तो सत्य की अभिव्यक्ति होना आवश्यक है, पर सदा ऐसा नहीं होता। नैतिक मान्यताओं के विपरीत - प्लेटो ने काव्य को नैतिक मान्यताओं के विपरीत माना है। मानव जीवन में जो कुछ उदात्त और वांछनीय माना जाता है, काव्य में उसके विपरीत अनुदात्त और अवांछनीय व्यापार रहते हैं।  अज्ञान से उत्पन्न होने के कारण कविता शुद्ध - कविता की उत्पत्ति अज्ञान से होती है, इसलिए कविता श्रेष्ठ नहीं क्षुद्र है।  श्रेष्ठ काव्य के गुण - प्लेटो ने काव्य के गुण सरलता, धार्मिक या नैतिक विषयों वाला, कल्पना विरोधी, अतिशय भावुकता विरोधी और शिव का समर्थक माना है।  प्लेटो कविता में शक्ति, ज्ञान और अध्यात्म का पक...

तलाकशुदा माता-पिता की संतान की मानसिकता पर आधारित उपन्यास का नाम क्या है?

1. तलाकशुदा माता-पिता की संतान की मानसिकता पर आधारित उपन्यास का नाम क्या है? उत्तर - आपके प्रश्न का जवाब यह है - तलाकशुदा माता-पिता की संतान की मानसिकता पर आधारित उपन्यास का नाम आपका बंटी नामक उपन्यास है।  आपका बंटी उपन्यास मन्नू भंडारी के द्वारा लिखा गया उपन्यास है जो की 1970 में लिखा गया था।  Talaksuda mata-pita ki santan ki mansikta par aadharit upnyas ka naam kya hai?

अंधायुग के पात्रों के नाम लिखिए।

 1. अंधायुग के पात्रों के नाम लिखिए।  उत्तर - अंधायुग के पात्रों के नाम इस प्रकार हैं - अश्वत्थामा  वृद्धयाचक युयुत्सु  धृतराष्ट्र  Andhayug ke pramukh patro ke naam likhiye?

कीनैं हूँ कोरिक जतन अब कहि काढ़ै कौनु... इस दोहे में क्या प्रस्तुत है

1. कीनैं हूँ कोरिक जतन अब कहि काढ़ै कौनु। भो मन मोहन-रूप मिलि पानी मैं कौ लौनु।। इस दोहे में क्या प्रस्तुत है? उत्तर - उपर्युक्त दोहे की पंक्तियों में नायिका का कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम व्यंजित है। नायिका के मन रूपी सरोवर में कृष्ण का लावण्य पानी में नमक की तरह घुल गया है। उपर्युक्त पंक्तियां बिहारी सतसई से ली गयी हैं जिसका सम्पादन जगन्नाथ दास रत्नाकर ने किया था। जगन्नाथ दास रत्नाकर का जन्म 1866 में हुआ था और मृत्यु 22 जून 1932 को हुआ था। Kinai hun korik jatan ab kahi kadhai kaunoo. Bho man mohan roop mili pani mai kau launu.

'गीत फरोश' में कवि क्या कहना चाहता है?

 1. 'गीत फरोश' में कवि क्या कहना चाहता है? उत्तर - गीत फरोस में कवि कहना चाहता है कि - दूसरों के मनमाफिक कविता लिखने और बेचने के लिए कवि विवश है। गीत फरोश भवानी प्रसाद मिश्र का पहला कविता संग्रह है जिसका प्रकाशन 1956 में हुआ था। Geetfarosh me kavi kya kahana chahata hai?

रामचन्द्र शुक्ल का कबीर के सम्बंध में क्या मत है?

 1. आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी का कबीर के सम्बंध में क्या विचार है बताइए। उत्तर - आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी का कबीर दास के सम्बंध में विचार कुछ इस प्रकार है - 'तात्विक दृष्टि से न तो हम इन्हें (कबीर को) पूरे अद्वैतवादी कह सकते हैं और न एकेश्वरवादी।' आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म 4 अक्टूबर 1884 को बस्ती जिले में हुआ था। Acharya ramchandra shukla ka kabir ke sambandh me kya mat hai?

मैं कहता हौं आँखिन देखी, तू कहता कागद की लेखी

 1. 'मैं कहता हौं आँखिन देखी, तू कहता कागद की लेखी' इस काव्य पंक्ति का आशय क्या है? उत्तर - उपर्युक्त पंक्ति का आशय है कि स्वानुभव शास्त्रीय ज्ञान से बड़ा है। Mai kahata hain aankhin dekhi, tu kahata kagad ki lekhi is kavya pankti ka aashay kya hai?

अरस्तू के विरेचन पद की व्याख्या विद्वानों ने किन अर्थों में की है?

 1. अरस्तू के विरेचन पद की व्याख्या विद्वानों ने किन अर्थों में की है? उत्तर - अरस्तू के विरेचन पद की व्याख्या विद्वानों ने निम्न दो  अर्थों में की है-  धर्मपरक कलापरक Arastu ke virechan siddhant pad ki vyakhya vidvanon ne kin artho me ki hai? अरस्तु के विरेचन सिद्धांत

एक साहित्यिक की डायरी किसकी रचना है?

 1. एक साहित्यिक की डायरी किसकी रचना है? उत्तर -  एक साहित्यिक की डायरी गजानन माधव मुक्तिबोध रचना है। जिनका जन्म 13 नवम्बर 1917 को ग्वालियर मध्यप्रदेश में हुआ था। तथा जिनकी मृत्यु 11 सितम्बर 1964 को हबीब गंज, भोपाल में हुई थी। Ek sahityik ki diary kisaki rachna hai?

प्रवास की डायरी किसकी रचना है

 1.  प्रवास की डायरी किसकी रचना है? उत्तर - प्रवास की डायरी हरिवंशराय बच्चन की रचना है, यह एक डायरी साहित्य है। हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवम्बर 1907 को हुआ था। एवं मृत्यु 18 जनवरी 2003 को हुई थी। Pravas ki dayari kisaki rachna hai?

कॉलरिज का कल्पना सिद्धंत क्या कहता है?

 1. कॉलरिज का कल्पना सिद्धांत क्या कहता है? उत्तर - आपके प्रश्न का जवाब कुछ इस प्रकार है कॉलरिज का कल्पना सिद्धांत कहता है कि- कल्पना कारयित्री प्रतिभा है, यही कवि की सर्जनात्मकता है। कल्पना का मूल प्रकृति केवल अनुकृतिपरक है। Coleridge ka kalpna siddhant kya kahata hai?

औचित्य के प्रमुख भेदों का उदाहरण सहित परिचय दीजिए।

प्रश्न 14. औचित्य के प्रमुख भेदों का उदाहरण सहित परिचय दीजिए। अथवा औचित्य कितने प्रकार का होता है ? प्रत्येक का लक्षण और उदाहरण प्रस्तुत कीजिए। उत्तर - Table of Content औचित्य सिद्धांत परिचय रसानुभूति में चमत्कार उत्पन्न करने वाला औचित्य सिद्धांत की मौलिकता औचित्य की स्थापना काव्य के अंग के रूप में औचित्य की सर्वव्यापकता औचित्य और रस उपसंहार औचित्य सिद्धांत परिचय आचार्य क्षेमेन्द्र ने अपने ग्रन्थ 'औचित्य-विचार चर्चा' में औचित्य के सत्ताईस (27) भेदों का निरूपण किया है, किन्तु काव्य के प्रत्येक अंग में औचित्य के व्याप्त होने के कारण उसके अनेक भेद हो सकते हैं। इसे औचित्य के भेदों की विवेचना भी कहते हैं. डॉ. उमाशंकर शर्मा 'ऋषि' ने अपने ग्रव्य 'संस्कृत-साहित्य का इतिहास में आचार्य क्षेमेन्द्र, उनके 'औचित्य- विचार - चर्चा' और औचित्य के विभाजन के विषय में इस प्रकार कहा है -  औचित्य के भेदों का विवेचन    "कश्मीर निवासी क्षेमेन्द्र ने प्रायः 40 ग्रन्थों की रचना विविध साह...

औचित्य सम्प्रदाय के आचार्यों ने जो प्रमुख स्थापनाएँ की हैं, उन पर प्रकाश डालिए।

प्रश्न 13. औचित्य सम्प्रदाय के आचार्यों ने जो प्रमुख स्थापनाएँ की हैं, उन पर प्रकाश डालिए। उत्तर - Table of Content परिचय औचित्य रससिद्ध काव्य का स्थायी जीवन तत्व है।  औचित्य की परिभाषा  आचार्य क्षेमेन्द्र का कथन  अलंकारों में अलंकारत्व का आधान औचित्य के कारण  रस के विनियोजन में औचित्य विधान परमावश्यक  काव्य के प्रत्येक अंग में औचित्य की व्याप्ति  औचित्य सिद्धान्त की प्रमुख स्थापनाएँ परिचय - काव्यशास्त्र में औचित्य सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य क्षेमेन्द्र माने जाते हैं। उन्होंने 'औचित्य-विचार-चर्चा' नामक ग्रन्थ की रचना की है। उन्होंने अपने इस ग्रन्थ में स्पष्ट रूप से औचित्य को काव्य का जीवन-तत्त्व बताते हुए पहली स्थापना की है - औचित्य सिद्धांत (1) ' औचित्य रससिद्धस्य स्थिर काव्यस्य जीवितम् । ' ( औचित्य रससिद्ध काव्य का स्थायी जीवन तत्त्व है। ) आचार्य क्षेमेन्द्र की इसी स्थापना के आधार पर उन्हें औचित्य सम्प्रदाय का प्रवर्तक माना गया है। यह बात सत्य नहीं है कि काव्य के औचित्य का महत्व स्वीका...

औचित्य सिद्धान्त का परिचय देते हुए बताइये कि यह काव्य का मौलिक सिद्धान्त है अथवा सहायक सिद्धान्त है?

प्रश्न 12. औचित्य सिद्धान्त का परिचय देते हुए बताइये कि यह काव्य का मौलिक सिद्धान्त है अथवा सहायक सिद्धान्त है? उत्तर - Table of Content औचित्य सिद्धांत का स्वरूप या अर्थ औचित्य सिद्धांत औचित्य सिद्धांत के भेद  औचित्य सिद्धांत का महत्व औचित्य सिद्धांत का इतिहास औचित्य सिद्धांत और अन्य सम्प्रदाय उपसंहार औचित्य सिद्धांत का स्वरूप या अर्थ - उचित का भाव। उचित शब्द से भाववाचक व्यञ प्रत्यय होकर 'औचित्य' शब्द बनता है। व्यवहार, आचरण, गतिविधि, काव्य-रचना आदि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में औचित्य का महत्त्व है। जो काम, वस्तु अथवा व्यवहार उचित नहीं होगा, उसे सहृदय भावुक क्या, मूर्ख व्यक्ति भी रुचिकर नहीं समझेगा। काव्यशास्त्र में औचित्य शब्द का अर्थ अत्यन्त व्यापक है। भाव, रस, अलंकार, रीति आदि कवि-कर्म की समस्त प्रक्रियाएँ औचित्य के अन्तर्गत आती है। औचित्य शब्द का प्रयोग न करते हुए भी भरतमुनि से लेकर परवर्ती आचायों ने उन सब बातों को काव्य के लिए आवश्यक बताया है जो औचित्य के अन्तर्गत आती हैं औचित्य पर विस्तारपूर्वक चर्चा सर्वप्रथम आचार्य...

ध्वनि सिद्धान्त की प्रमुख स्थापनाओं का वर्णन कीजिए।

प्रश्न 11. ध्वनि सिद्धान्त की प्रमुख स्थापनाओं का वर्णन कीजिए।  अथवा ध्वनि सिद्धान्त की प्रमुख स्थापनाओं पर प्रकाश डालिए।   ध्वनि सिद्धान्त की प्रमुख स्थापनाएँ Table of Content परिचय  सिद्धांत की प्रमुख स्थापनाएँ  आनंदवर्धन पर पूर्व   स्वीकृति और खंडन  मानने वालों का विकल्प  उपनिषद्भुतम  मन में आनंद प्रतिष्ठा  ध्वनि भेद स्थापना  प्रतीयमानता स्थापना आत्मा की स्थापना   ओके बाय उत्तर :               परिचय - आचार्य आनन्दवर्धन को ध्वनि सिद्धान्त का संस्थापक माना जाता है। वैसे आचार्य आनन्दवर्धन ने यह संकेत किया है कि प्राचीन आचार्य भी ध्वनि को काव्य की आत्मा मानते थे, पर न तो आचार्य आनन्दवर्धन ने उन आचार्यो का उल्लेख किया है तथा न ही किसी अन्य आचार्य ने ऐसे काव्यशास्त्री का नाम लिया है, जिसने ध्वनि को काव्य की आत्मा स्वीकार अथवा घोषित किया हो। ' ध्वन्यालोक ' का पहला छन्द इस प्रकार है...

ध्वनि सिद्धांत के उद्भव एवं विकास पर प्रकाश डालते हुए ध्वनि सम्प्रदाय की मान्यताओं का विवेचन कीजिए।

प्रश्न 10. ध्वनि सिद्धान्त के उद्भव एवं विकास पर प्रकाश डालते हुए ध्वनि सम्प्रदाय की मान्यताओं का विवेचन कीजिए।  Content ध्वनि सिद्धांत परिचय  ध्वनि सम्प्रदाय  संस्कृत आचार्य  हिंदी आचार्य  ध्वनि सिद्धांत का विरोध  ध्वनि के भेद  ध्वनि और अन्य सम्प्रदाय  उपसंहार ध्वनि सिद्धान्त परिचय उत्तर- 'ध्वनि' से तात्पर्य स्वर अथवा आवाज से है अर्थात् जिससे ध्वनि उत्पन्न होती है, उसे ही 'ध्वनि' कहते हैं - 'ध्वन्यते अनने इति ध्वनि।' इसकी व्युत्पत्ति 'ध्वन्' धातु में 'ड' के प्रत्यय के जुड़ने से होती है। इसका प्राचीनतम प्रयोग अथर्ववेद में मिलता है - 'ध्वनयो यन्तु शोभम्।" अलंकारवादियों ने ध्वनि का प्रयोग पाँच अर्थों में किया है -  ध्वनयति यः व्यञ्जक शब्दः स ध्वनिः - उस व्यंजक शब्द को ध्वनि कहते हैं, जो ध्वनित करे या कराये। ध्वनति ध्वनयति या यः स व्यश्यकः अर्थ ध्वनिः - वह व्यंजक अर्थ ध्वनि है, जो ध्वनि करे या कराये। ध्वन्यते इति ध्वनिः - जो ध्वनित हो, उसे ध्वनि कहते हैं।  ध्वन्यते अनने इति ध्वनिः - जिसके द...

भिन्न-भिन्न आचार्यों ने वक्रोक्ति के जो भेद माने है, उनका विवेचन कीजिए।

प्रश्न 9. भिन्न-भिन्न आचार्यों ने वक्रोक्ति के जो भेद माने है, उनका विवेचन कीजिए। अथवा आचार्य कुन्तक तथा मम्मट ने वक्रोक्ति के जो भेद किये है, उन पर प्रकाश डालिए।  वक्रोक्ति सिद्धांत परिचय उत्तर  - वक्रोक्ति शब्द का प्रयोग साहित्य और दैनिक व्यवहार में प्राचीन काल से होता आया है, पर इसे अलंकार के रूप में सबसे पहले अलंकारवादी आचार्य भामह ने स्वीकार किया है। दैनिक व्यवहार में इसका संधि-विच्छेद - वक्र + उक्ति तथा इसका अर्थ उक्ति वैचित्र्य अथवा कथन वक्रता माना जाता था। वक्रोक्ति को अलंकार के रूप में सबसे पहले आचार्य भामह ने स्वीकार किया तथा इसे अतिशयोक्ति का पर्याय बताया। तात्पर्य यह है कि भामह ने यह स्वीकार किया कि वक्रोक्ति का ही दूसरा नाम अतिशयोक्ति है। आचार्य भामह ने स्पष्ट शब्दों में वक्रोक्ति को ही काव्य की आत्मा न कहकर इसे काव्य का जीवनधायक तत्त्व स्वीकार किया है। वैसे जीवनाधायक का अर्थ भी लगभग आत्मा ही स्वीकार करना है, क्योंकि जीवन का आधान शरीर में आत्मा ही करती है। आत्मा से हीन व्यक्ति के शरीर में जीवन नहीं रहता। भामह अलंकार को काव्य की आत्मा मानते थे। भामह अलंकार सम्प्रद...