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भ्रमरगीत सार : सूरदास पद क्रमांक 88 सप्रसंग व्याख्या By Khilawan

  भ्रमरगीत सार आचार्य रामचंद्र शुक्ल 

अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने भ्रमर गीत के पद क्रमांक 87 की व्याख्या को अपने इस ब्लॉग questionfieldhindi.blogspot.com में पब्लिस किया था। आज हम भ्रमर गीत पद क्रमांक 88 की सप्रसंग व्याख्या के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं।

पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय (PRSU) के एम.ए. हिंदी साहित्य (MA Hindi) के पाठ्यक्रम में 'भ्रमरगीत सार' (संपादक: आचार्य रामचंद्र शुक्ल) द्वितीय सेमेस्टर (Second Semester) के अंतर्गत पढ़ाया जाता है। यह पुस्तक दूसरे सेमेस्टर के मध्यकालीन काव्य प्रश्न-पत्र के पाठ्यक्रम का मुख्य हिस्सा है।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या

  पद क्रमांक 88 व्याख्या 

सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल

bhrmar-geet-sar-surdas-ke-pad - 88

श्री कृष्ण का वचन उद्धव-प्रति

88. राग गौरी
ऊधो ! क्यों राखौं ये नैन ?
 सुमिरि सुमिरि गुन अधिक तपत हैं सुनत तिहारो बैन।।
हैं जो मन हर बदनचंद के सादर कुमुद चकोर।
परम-तृषारत सजल स्यामघन के जो चातक मोर।
मधुप मराल चरनपंकज के, गति-बिसाल-जल मीन।
चक्रबाक, मनिदुति दिनकर के मृग मुरली आधीन।।
सकल लोक सूनी लागतु है बिन देखे वा रूप।
सूरदास प्रभु नंदनंदन के नखसिख अंग अनूप।।

शब्दार्थ - राखौं = रोकूँ या समझाऊँ। तपत = तपते हैं - दुखी होते हैं। तिहारों बैन = तुम्हारी वाणी। मनहर = मन का हरण करने वाला। वदनचंद = मुखचन्द्र वाले। कुमुद = कमलिनी जो चंद्र को देखकर विकसित हो उठती है। तृषारत = प्यासे। मराल = हंस। गति-विलास-जल = चंचल गति रूपी जल प्रवाह। चक्रवाक = चकवा-चकवी। मणिदुति = मणि की धुति। सकल लोक = सम्पूर्ण। वारूप = उस रूप को देखे बिना। 

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग - गोपियां कृष्ण के वियोग में व्यथित हैं और वे अनेक युक्तियों से नेत्रों के विभिन्न उप मानव से उम्मीद करती हुई यह प्रभावित करना चाहती हैं की कृष्णा के आदर्श से इनकी हालत दिनोंदिन बिगड़ती जा रही है।

 व्याख्या - वे उद्धव से कह रहे हैं कि उद्धव हम अपने नेत्रों को किस प्रकार और किस लिए समझाएं हमें कृष्ण की ओर से कोई आशा भी तो नहीं जगती प्रतीत नहीं होती है। 

हमारे ये नेत्र कृष्ण के सुंदर मुखचंद के लिए कुमुद और चकोर हैं, जिन्होंने निरख-निखरकर ही विकास करना सीखा है। यह उसी ओर टकटकी लगाकर देखते रहने में ही संतोष लाभ करते हैं। यह हमारे नेत्र उन सजल घनश्याम की रूप-माधुरी के लिए परम प्यासे मयूर और चातक हैं तथा उनके चरण कमलों पर अटल अनुराग करने वाले यह भ्रमर और हंस हैं। 

यदि उनका लीला पूर्ण घमंड जल प्रवाह है तो हमारे नेत्र उसी जल प्रवाह में रहने वाले मीन हैं अर्थात मछली हैं कृष्ण के वक्ष स्थल पर चमकते हुए मणि प्रभाकर के लिए ये नेत्र चक्रवाक ही तो हैं और उनकी मधुर मूर्ति के लिए मृग हैं। 

इस प्रकार हमारे नेत्र उनकी प्रत्यंग व्यापिनी माधुरी पूर्ति पर पूरी तरह मोहित हैं। यदि वह कृष्ण का रूप इन्हें नहीं दिखता है, तो इन्हें सारा संसार सुना प्रतीत होता है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण का समस्त रूप सौंदर्य अप्रतिम है- उसकी कोई तुलना ही नहीं है अर्थात अद्वितीय है। यदि से इतना सौंदर्य प्राप्त ना होता तो संसार का सौंदर्य ही इसके बिना फिका होता। 

वस्तुतः वही सौंदर्य तो सांसारिक सौंदर्य का मूल है, उसकी स्थिति से ही समस्त सौंदर्य सुंदर होता है अगर वह नहीं तो यह समस्त सौंदर्य शुष्क और निरश है। 

विशेष - इस पद में रूपक अलंकार का उद्भव अद्भुत और रमणीय प्रयोग किया गया है कवि अधिक कलात्मक हो गया है। 


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