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भ्रमरगीत सार : सूरदास पद क्रमांक 86 सप्रसंग व्याख्या By Khilawan

भ्रमरगीत सार आचार्य रामचंद्र शुक्ल 

अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने भ्रमर गीत के पद क्रमांक 85 की व्याख्या को अपने इस ब्लॉग questionfieldhindi.blogspot.com में पब्लिस किया था। आज हम भ्रमर गीत पद क्रमांक 86 की सप्रसंग व्याख्या के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या

  पद क्रमांक 86 व्याख्या 

सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल

bhrmar-geet-sar-surdas-ke-pad - 86

श्री कृष्ण का वचन उद्धव-प्रति

86. राग नट
सँदेसो कैसे कै अब कहौं ?
इन नैनन्ह तन को पहरो कब लौं देति रहौं ?
जो कछु बिचार होय उर -अंतर रचि पचि सोचि गहौं।
मुख आनत ऊधौं-तन चितवन न सो विचार, न हौं।।
अब सोई सिख देहु, सयानी ! जातें सखहिं लहौं।
सूरदास प्रभु के सेवक सों बिनती कै निबहौं।।

शब्दार्थ - नैनन्ह = नेत्रों। देती रहौं = देता रहूँ। उर अंतर = हृदय के भीतर। रचि-पचि = अच्छी तरह से। ऊधौतन = उद्धव के शरीर। चितवत = देखते ही। न हौं = नहीं रह जाता है। लहौं = प्राप्त कर लें। प्रभु के सेवक = उद्धव। निबहौं = निर्वाह करूँ। 

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के भ्रमरगीत सार से लिया गया है यह सूरदास की रचना है जिसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सम्पादित किया है। 

प्रसंग - कृष्ण ने प्रेम मार्ग की  निष्ठुरता का परिचय दिया है और गोपियां उनकी निष्ठुरता को सहन नहीं कर पा रही हैं।  उन्हें सबसे अधिक इस बात की चिंता है कि कृष्ण ने प्रेम का उत्तर प्रेम से देने की अपेक्षा योग का संदेश दिया है और वह भी उद्धव जैसे प्रेम - भावना विरहित व्यक्ति के द्वारा एक गोपी अपनी इसी दुविधा को व्यक्त करते हुए अपनी सहेली से कह रही हैं-

व्याख्या - अब मैं कृष्ण के लिए संदेश किस प्रकार भेजूं अर्थात विचारणीय यह है कि ऐसे पत्थर दिल व्यक्ति को संदेश भेजना उचित भी है या नहीं। 

 मैं अपने इस तन पर नेत्रों का पहरा कब तक लगाती रहूं। भाव यह है कि कृष्ण वियोग में पहले से ही क्षीण हुआ यह मेरा शरीर अब इस निष्ठुर योग संदेश को सुनकर जीवित नहीं रहना चाहता है किंतु ये नेत्र हैं कि अभी तक यह आस लगाए बैठे हैं कि कृष्ण के दर्शन अवश्य होंगे। 

यही कारण है कि मेरे शरीर पर निरंतर पहरा लगाते रहते हैं। मैं चाहूं भी तो मुझे प्राण छोड़ने नहीं देते हैं। कितनी आशावादीता है?

 गोपी कहती हैं कि कभी मेरे हृदय में कृष्ण को संदेश देने की बात उठती है तो भी मैं बहुत सोच-विचार कर और मन मार कर रह जाती हूं। कारण यह है कि जिस व्यक्ति ने हमें योग का संदेश भेजा है उसके लिए संदेश-प्रेम-संदेश किस बल पर भेजा जाए। इतने पर भी यदि हिम्मत करके मैं कुछ कहना चाहती हूं; संदेश की बात मेरे मुख तक आ जाती है। 

मैं उसे कहना चाहती हूं कि, इन उद्धव की निगाह जाते ही न मेरे वे विचार ही रहते हैं और न मैं ही। भाव यह है कि योग का संदेश भेजने वाले कृष्ण के मित्र इन उद्धव को देखकर ही मैं कर्तव्य पूर्ण हो जाती हूं की इतने निष्ठुर और हृदयहिन व्यक्ति के द्वारा मैं अपना संदेश कैसे भेजूं? 

इन्हें देखने देखते ही वे संपूर्ण विचार गायब हो जाते हैं और मैं संज्ञाहीन हुई सी हो उठती हूँ। मन में आए संपूर्ण विचार बिखड़ जाते हैं और उनके बिखरते ही अपनी सभी सुधि-बुधि भूल जाती हूं।

अतः हे सखी अब तो कोई ऐसी सलाह दो जिससे कि मैं कृष्ण को प्राप्त कर सकूं सूरदास कहते हैं कि गोपी अपनी सखियों से पूछने लगी की, यह जो कृष्ण का मित्र उद्धव आया है, इससे किस ढंग से प्रार्थना की जाए अर्थात किस रीति से उद्धव जी को समझा-बुझाकर यह तय किया जाए कि हमें तुम कृष्ण के दर्शन करा दो और अपनी इस योग-चर्चा को बंद कर दो। 

  विशेष  - पद की अंतिम पंक्तियों में यह व्यंजित होता है कि आवश्यकता पड़ने पर किसी अनपेक्षित व्यक्ति को भी अपना आधार बना लेना चाहिए। गधे को बाप बना लेने वाली व्यंजना है। गोपियों की निरीहअवस्था का मार्मिक चित्रण किया गया है 
 
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