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भ्रमरगीत सार : सूरदास पद क्रमांक 87 सप्रसंग व्याख्या By khilawan

 भ्रमरगीत सार आचार्य रामचंद्र शुक्ल 

अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने भ्रमर गीत के पद क्रमांक 86 की व्याख्या को अपने इस ब्लॉग questionfieldhindi.blogspot.com में पब्लिस किया था। आज हम भ्रमर गीत पद क्रमांक 87 की सप्रसंग व्याख्या के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या

  पद क्रमांक 87 व्याख्या 

सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल

bhrmar-geet-sar-surdas-ke-pad - 87

87. राग कान्हरो
बहुरो ब्रज यह बात न चाली।
वह जो एक बार ऊधो कर कमलनयन पाती दै घाली।।
पथिक ! तिहारे पा लगति हौं मथुरा जाब जहां बनमाली।
करियो प्रगट पुकार द्वार ह्वै 'कालिंदी फिरि आयो काली'।।
जबै कृपा जदुनाथ कि हम पै रही, सुरुचि जो प्रीति प्रतिपाली।
मांगत कुसुम देखि द्रुम ऊँचे, गोद पकरि लेते गहि डाली।।
हम ऐसी उनके केतिक हैं अग-प्रसंग सुनहु री, आली !
सूरदास प्रभु रीति पुरातन सुमिरि राधा-उर साली।।

शब्दार्थ - बहरों = फिरि। चाली = चली। घाली = भेजी। पाँ लागति हौं = पैरों पड़ती हूँ। बनमाली = कृष्ण। काली = काली-नाग। कालिंदी = यमुना में। जदुनाथ = यादवनाथ-कृष्ण। प्रीति प्रतिपाली = प्रणय का पालन किया। पकरि = पकड़। गहि डाली = डाली को पकड़ कर। केतिक = कितनी ही। आली = सखी। पुरातन = प्राचीन। सुमिरि = स्मरण करके। साली = पीड़ा देती है या कष्ट देती है।

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग - इस पद में उस समय का वर्णन किया गया है, जब उद्धव संदेश देकर वापस में मथुरा चले गए हैं और उसके अनंतर भी गोपियों की परेशानी दूर नहीं हुई है। और उस समय राधा व्याकुल हो उठी और किसी पथिक के द्वारा कृष्ण तक संदेश भेजने के लिए तैयार हो गई हैं।

 व्याख्या - गोपियां पथिक को संबोधित करते हुए कह रहे हैं हे पथिक! हे उद्धव ब्रज में फिर कभी उस बात की चर्चा नहीं हुई जो एक बार उद्धव द्वारा कमलनयन कृष्ण ने अपनी पत्रिका भेजकर प्रारंभ की थी अर्थात उद्धव के अलावा कोई भी अन्य संदेशवाहक नहीं आया है जिसने कृष्ण विषयक कोई भी बात कही हो।

ध्वनि यह है कि उस समय निर्गुण-उपदेश के माध्यम से सही किंतु कृष्ण की चर्चा सुनने को मिल तो गई थी किंतु अब तो कोई नहीं आया गया है।

परिणामतः कृष्णा की कोई भी चर्चा सुनने को नहीं मिली है। अतः राधा पथिक के पैरों को पड़ती हुई कह रही हैं कि हे राहगीर! मैं तेरे कदम छूती हूं आप कृपा करके वहां चले जाइए। जहां वनमाली कृष्ण निवास करते हैं।

वह आगे कह रहीं हैं कि तुम उनके दरवाजे पर पहुंचकर दूर से ही इस प्रकार पुकारना की हे प्रभु! यमुना में फिर से काली नाग आकर रहने लगा है। बहुत संभव है कि कृष्ण इस बात को सुनकर पूर्व की भांति उसे मारने के लिए ही जाएं।

हमें पूर्ण विश्वास है कि हमारी उनकी प्रीति की पुरातनता उन्हें यहां आने के लिए विवश कर देगी। अर्थात वे आ जाएंगे तुम अच्छी तरह समझ लो कि कृष्ण जब यहां रहा रहते थे तब वे सदैव कृपा किया करते थे। उनका प्रणय-भाव पूरी 'सुरुचि' के साथ हमें सदैव प्राप्त होता रहता था। 

जब हम किसी वृक्ष पर ऊंचाई पर लगा हुआ पुष्प मांगती थी तो कृष्ण हमें गोद में उठा लेते थे और हम डाली पकड़कर उस अभीष्ट फल या फूल को तोड़ लेती थीं। ऐसी प्रीति थी तब हमें विश्वास है कि वे हमारे कष्टों को सुनकर अवश्य ही आएंगे। हे सखी! हम जैसी उनके कितनी ही प्रेयसी ना होंगी।

अतः हे सखी ध्यान से सुन लो! हमारे पास कृष्ण विषयक अनेक कथाएं और कथाएं मौजूद हैं भाव यह है कि कृष्ण सदैव ऐसे ही प्रेम रस भरी अनेक प्रकार की क्रीडाएं किया करते थे। 

सूरदास कह रहे हैं कि इस प्रकार राधा और कृष्ण के उन विगत प्रेम भरे व्यवहारों को याद कर करके अत्यंत विह्वल होने लगी कृष्ण की स्मृतियां उसे पीड़ित करने लगी।

विशेष

कथा प्रवाह की दृष्टि से इस पद के अनौचित्य का प्रश्न उठना सहज और स्वभाविक है कारण इसके बाद भी गोपियों और उद्धव का संवाद चलता रहता है और यह पद बीच में ही उस भाव को संकेतित करता है कि उद्धव चले गए और गोपियों ने संदेश फिर भेजा। 

अतः इस दृष्टि से यह पद उद्धव-गोपी वार्तालाप के अनंतर ही रखा जाना चाहिए। नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित सूरसागर में यह पद नहीं मिलता है।

कुछ विद्वानों ने इस पद का महत्व स्वीकार किया है और यहां तर्क दिया है कि " इसमें राधा मुखर हो उठी हैं। इससे पूर्व के या बाद के पदों में भी हम राधा को प्रायः मौन ही पाते हैं।"

"यद्यपि सूरसागर में अनेक ऐसे पद मिलेंगे जहां राधा उद्धव द्वारा कृष्ण की ओर संदेश भेजती हैं परंतु ना मालूम क्यों आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भ्रमरगीत सार में इस प्रकार के पदों को सम्मिलित नहीं किया है।"


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