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भ्रमर-गीत-सार : सूरदास पद क्रमांक 58 की व्याख्या - By Khilawan

Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya

 
आपको बता दें की पिछली बार हमने हमारे इस ब्लॉग पर भ्रमर गीत के 57 वें पद की व्याख्या को पोस्ट किया था और अभी हम इसी भ्रमर गीत के 58 वें पद की व्याख्या पढ़ेगे तो चलिए शुरू करते हैं। 
भ्रमरगीत पद 58 व्याख्या  
- संपादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल 

भ्रमरगीत सार की व्याख्या

58. राग मारू 

मोहिं अलि दुहूँ भाँति फल होत। 
तब रस-अधर लेति मुरली अब भई कूबरी सौत।।
तुम जो जोगमत सिखवन आए भस्म चढ़ावन अंग। 
इत बिरहिन मैं कहुँ कोउ देखी सुमन गुहाये मंग। 
कानन मुद्रा पहिरि मेखली धरे जटा आधारी।।
यहाँ तरल तरिवन कहैं देखे अरु तनसुख की सारी।।
परम् बियोगिन रटति रैन दिन धरि मनमोहन-ध्यान। 
तुम तों चलो बेगि मधुबन को जहाँ-जहाँ जोग को ज्ञान। 
निसिदिन जीजतु है या ब्रज में देखि मनोहर रूप। 
सूर जोग लै घर-घर डोली, लेहु लेहु धरि सूप।।

शब्दार्थ - दुहुँ भाँती=दोनों अवस्थाओं में। जोगमत=योग-साधना। सुमन=पुष्प। मंग=माँग। गुहाये=सजाई हो। कानन=कानों में। मेखली का घनी तन सुख=एक प्रकार का झीना कपड़ा। सारी=साड़ी। जोग को ज्ञान=योग के ज्ञाता, पारखी। निसिदिन=रात-दिन। जीजतु=जीती हैं। 

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के भ्रमरगीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग - गोपियाँ अपने भाग्य को दोष देती हुई कह रही हैं। 

व्याख्या - गोपियाँ उद्धव से कहती हैं हे उद्धव / हे भ्रमर हमें तो दोनों ही अवस्थाओं में चाहें वो कृष्ण का सामीप्य हो या आज जब हम उनसे  दूर हैं इन दोनों ही अवस्थाओं में हमें एक ही जैसा फल मिला है। जब कृष्ण हमारे निकट थे तब मुरली उनके होठों पर हमेशा सजी रहती थी और वह मुरली ही उनके अधरों का पान किया करती थी। उनकी होठों से लगी रहती थी और इस अमृत से हम वंचित थे और आज वह कुबरी, वह कुब्जा हमारी शौत बन गई है। आज मुरली का स्थान उस कुब्जा ने ले लिया है और वह कुब्जा कृष्ण के सामीप्य का लाभ उठा रही है। 

तुम हम विरहणियों को योग साधना के द्वारा प्राप्त निर्गुण ब्रम्ह का उपदेश देने के लिए आये हो और चाहते हो की हम अपने शरीर पर भस्म का लेप कर लें। 

क्या तुमने कभी किसी गोपी को अपने मांग में फूल चढ़ाये देखा है तुम हमें कह रहे की हम अपने कानों में मुद्रा पहन कर नुज की करधनी जटा जुट और अथारी धारण करें। मुझे एक बात बताओ क्या तुमने हम में से किसी को अपने कानों में कर्ण-फूल या तनसुक कपड़े से बनाई हुई साड़ी धारण किये हुए देखा है हम तो कृष्ण के प्रेम के विरह में संतप्त हैं और हम तो पहले ही शरीरिक साज सज्जा और शृंगार साधन को छोड़ दिया है और हम तो पहले से ही योगिनी बनी हुई हैं। 

हे उद्धव उचित यहीं होगा की तुम शीघ्र ही मथुरा नगरी लौट जाओ क्योंकि वहां तुम्हें तुम्हारे इस योग के अनेक पारखी मिलेंगे और इसलिए वहीं तुम्हारे इस योग का आदर सम्मान हो पायेगा हम तो रात दिन कृष्ण के मनोहर रूप को देखकर और स्मरण करके जीवित रही हैं। हे उद्धव तुम अपने इस योग को व्यर्थ ही लादे हुए घर-घर घूम रहे हों अपना समय बर्बाद कर रहे हो। क्योकि यहां तुम्हारे इस योग का कोई ग्राहक नहीं है और इसीलिए तुम वहीं काम कर रहे हो जिस प्रकार कोई व्यपारी अपने ग्राहक से अपने माल को भली भाँती छान-फटक कर खरीदने का आग्रह करता है। 

लेकिन तुम चाहे जितना भी प्रत्यन कर लो हम तुम्हें विश्वास दिलाती कि तुम्हारी इस बेकार की चीज का यहां खरीददार नहीं मिलेगा। इस ब्रज में इसकी कोई उपयोगिता नहीं है इसलिए तुम इसे लेकर के मथुरा चले जाओ। वहाँ इसके पारखी हैं और तुम उन्हीं को जाकर के यह ज्ञान योग की शिक्षा देना। 

विशेष - प्रस्तुत पद में कुब्जा से ईर्ष्या प्रकट की गई है। 


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