Skip to main content

भ्रमर-गीत-सार : सूरदास पद क्रमांक 60 की व्याख्या - By Khilawan

Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya

 
अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने भ्रमर गीत के पद क्रमांक 59 की व्याख्या को अपने इस ब्लॉग में पब्लिस किया था। आज हम भ्रमर गीत पद क्रमांक 60 की सप्रसंग व्याख्या के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं।
भ्रमरगीत पद 60 व्याख्या
- सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल

भ्रमरगीत सार की व्याख्या

60. राग सारंग 

अपनी सी कठिन करत मन निसिदिन। 
कहि कहि कथा, मधुप, समुझावति तदपि न रहत नंदनंदन बिन।।
बरजत श्रवन सँदेस, नयन जल, मुख बतियां कछु और चलावत। 
बहुत भांति चित धरत निठुरता सब तजि और यहै जिय आवत।।
कोटि स्वर्ग सम सुख अनुमानत हरि-समीप समता नहिं पावत। 
थकित सिंधु-नौका  खग ज्यों फिरि फिरि फेर वहै गुन गावत।।
जे बासना न बिदरत अंतर तेइ-तेइ अधिक अनूअर दाहत। 
सूरदास परिहरि न सकत तन बारक बहुरि मिल्यों है चाहत।। 

शब्दार्थ :  अपनी सी=अपने समान/जैसी, भरसक प्रयत्न करना। निसिदिन=दिवा रात्रि। तदपि=तो भी। बरजत=रोकती हैं। जिय=हृदय। खग=पक्षी। फिरि-फिरि=लौटकर। फेरी=पुनः। बासना=इच्छा। बिदरत=फटना। अंतर्=हृदय। अनुअर=निरंतर। दाहत=दग्ध करना। परिहरि=त्यागना, छोड़ना। तन=शरीर। बारक=एक बार। बहुरी=पुनः। 

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। इन पदों का सम्पादन उन्होंने सूरदास की रचना सूरसागर से किया है। 

प्रसंग : इस पद्यांश में सूरदास जी ने गोपियों की विरह व्यथा के कारण जो स्थिति उत्पन्न हुई है और विरह के कारण उनसे मन और शरीर में किस प्रकार सामंजस्य नही है उसको इस पद के माध्यम से बताया है। 

व्याख्या : गोपियाँ उद्धव से अपनी विवश्ता का वर्णन करते हुए कहती हैं कि हे उद्धव हम रात दिन अपने मन को अपने समान कठोर बनाये रखने का भरसक प्रत्यन करती रहती हैं। 

हे मधुप हम अपने इस मन को खूब समझाने का प्रयत्न करती हैं। अनेक प्रकार की कथाएँ कहती हैं ताकि यह कृष्ण से दूर हो जाए किन्तु यह चंचल मन हमारे सभी प्रयत्नों को निष्फल कर देता है। 

हम अपने कानों को कृष्ण का संदेश सुनने से रोकती हैं उनकी याद न आये और उनकी याद आकर आँखों में आँसू न आये इसके लिए हम कृष्ण के अलावा अन्य विषयों पर बात-चित करती हैं हम इस निष्ठुर मन को अनेक प्रकार से कठोर और दृढ़ बनाने का प्रयत्न करती हैं। 

लेकिन अन्य सभी बातों को छोड़कर हमारे हृदय कृष्ण के सानिध्य से जो सुख की अनुभूति करते हैं उसकी तुलना में करोड़ों स्वर्गों से प्राप्त सुख भी कुछ नहीं है अर्थात कृष्ण का सानिध्य और उससे प्राप्त सुख हमारे लिए श्रेष्ठ है। 

आगे गोपियाँ कहती हैं कि हमारा मन जो समुद्र में चलने वाली नौका होती है उसमें बैठे हुए उस थके हुए पक्षी के समान है। जो बार-बार उड़कर इधर-उधर जाने का प्रयास करता है लेकिन उसे कोई अन्य स्थान नहीं मिलता। अन्य कोई आसरा नहीं मिलता तो वह थक वापस जहाज पर ही वापस लौट लाता है। हमारा मन भी उसी प्रकार क्षण भर के लिए अन्य बातों में आकर्षण ढूंढने का प्रयत्न करता है किन्तु जब वहाँ उसे कोई सुख प्राप्त नहीं होता तो बार-बार लौटकर कृष्ण के ही गुण गाने लगता है। 

हमारा हृदय कृष्ण के वियोग से अनवरत दग्ध रहता है। दुखी रहता है। हम अपने शरीर को त्यागना नही चाहती क्योंकि यह शरीर जो है वह हृदय से कृष्ण के मिलने की आस लगाए हुए वियोग सुख की अनुभूति रखता है। 
हमारा यह हृदय दृढ़ नहीं हो पाता वह प्राणों को धारण किये हुए रहता है। 

विशेष :

  1. "थक्ति-खग में उपमा अलंकार है। 

Related Post

भ्रमर-गीत-सार : सूरदास पद क्रमांक 59 व्याख्या सहित

Comments

Popular posts from this blog

भ्रमरगीत सार : सूरदास पद क्रमांक 88 सप्रसंग व्याख्या By Khilawan

   भ्रमरगीत सार आचार्य रामचंद्र शुक्ल  अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने  भ्रमर गीत के पद क्रमांक 87 की व्याख्या  को अपने इस ब्लॉग  questionfieldhindi.blogspot.com  में पब्लिस किया था। आज हम  भ्रमर गीत पद क्रमांक 88 की सप्रसंग व्याख्या  के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय (PRSU) के एम.ए. हिंदी साहित्य (MA Hindi) के पाठ्यक्रम में ' भ्रमरगीत सार ' (संपादक: आचार्य रामचंद्र शुक्ल) द्वितीय सेमेस्टर (Second Semester) के अंतर्गत पढ़ाया जाता है। यह पुस्तक दूसरे सेमेस्टर के मध्यकालीन काव्य प्रश्न-पत्र के पाठ्यक्रम का मुख्य हिस्सा है। भ्रमरगीत सार की व्याख्या     पद क्रमांक 88 व्याख्या  -  सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल bhrmar-geet-sar-surdas-ke-pad - 88 श्री कृष्ण का वचन उद्धव-प्रति 88. राग गौरी ऊधो ! क्यों राखौं ये नैन ?  सुमिरि सुमिरि गुन अधिक तपत हैं सुनत तिहारो बैन।। हैं जो मन हर बदनचंद के सादर कुमुद चकोर। परम-तृषारत सजल स्यामघन ...

भ्रमर-गीत-सार : सूरदास पद क्रमांक 1 की व्याख्या By Khilawan

Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने  भ्रमर गीत सार के पद क्रमांक 1 से लेकर पद क्रमांक 10 को प्रकाशित किया था अब हम उनकी व्याख्या  को अपने इस ब्लॉग questionfieldhindi.blogspot.com में पब्लिस कर रहे हैं। आज हम  भ्रमर गीत  पद क्रमांक 1 की सप्रसंग व्याख्या  के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं... भ्रमरगीत सार की व्याख्या भ्रमरगीतसार पद क्रमांक 1 व्याख्या आज के इस पोस्ट में हम बात करने वाले हैं भ्रमरगीत सार के पद क्रमांक 1 की  सप्रसंग व्याख्या को लेकर जिसमें हम विभिन्न कठिन शब्दों के अर्थ भी जानेंगे। सबसे पहले शब्दार्थ को  जानते हैं फिर बात करेंगे भ्रमरगीत के संदर्भ और प्रसंग तथा व्याख्या की। चलिए शुरू करते हैं..   पहिले करि परनाम नंद सो समाचार सब दीजो।  औ वहां वृषभानु गोप सो जाय सकल सुधि लीजो।।  श्रीदाम आदिक सब ग्वालन मेरे हुतो भेंटियो।  सुख-सन्देस सुनाय हमारी गोपिन को दुख मेटियो।।  मंत्री एक बन बसत हमारो ताहि मिले सचु पाइयो।  सावधान है ...