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भ्रमर गीत सार सूरदास पद क्रमांक 4 सप्रसंग व्याख्या - By Khilawan

Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya

अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने भ्रमर गीत के पद क्रमांक 3 की व्याख्या को अपने इस ब्लॉग questionfieldhindi.blogspot.com में पब्लिस किया था। आज हम भ्रमर गीत पद क्रमांक 4 की सप्रसंग व्याख्या के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या

पद क्रमांक 4 व्याख्या 
- सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल

4.

हरि गोकुल की प्रीति चलाई।
सुनहु उपंगसुत मोहिं न बिसरत ब्रजवासी सुखदाई।।
यह चित होत जाऊँ मैं, अबही, यहाँ नहीं मन लागत।
गोप सुग्वाल गाय बन चारत अति दुख पायो त्यागत।।
कहँ माखन-चोरी? कह जसुमति 'पूत जेब' करि प्रेम।
सूर स्याम के बचन सहित सुनि व्यापत अपन नेम।।

शब्दार्थ : प्रीति चलाई = प्रेम प्रसंग की चर्चा। सुखदायी = सुखप्रदान करने वाले। यह चित होत = मन करता है। जेंव = खावो। करि प्रेम = प्रेम पूर्ण। आपन नेम = उद्धव का नियम मानकर।

संदर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके रचियता सूरदास जी हैं और सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग :- श्री कृष्ण उद्धव से ब्रजवासियों की प्रेम की चर्चा करते हुए चित्रित किये गए हैं। और उद्धव के आ जाने पर उनके सम्मुख ही श्री कृष्ण  ने  गोकुल का प्रेम प्रसंग छेड़ दिया है।

व्याख्या :- श्री कृष्ण उद्धव के आ जाने के बाद उन्हें गोकुल के प्रेम कथा का वर्णन करते हुए कहते हैं, हे उद्धव सुनो ब्रजवासी और उनके प्रति मेरा प्रेम भुलाये नही भूलता वे मेरे में सदा के लिए बसे रहते हैं।

वे मेरे मन में सदैव बसे रहते हैं क्योंकि उन्होंने मुझे अपने प्रेम से सदा सुख पहुंचाया है और इसी कारण मेरा मन यहाँ नहीं लगता। इक्षा होती है की मैं तुरंत वहां चला जाऊँ वहाँ जाकर गोप ग्वालाओं के साथ वन में गाये चराने जाया करता था। उनसे बिछड़ते समय मुझे अति दुःख हुआ था हे उद्धव आज भी मुझे गोकुल की कई बातें स्मरण हो आती हैं। न तो  अब वह माखन चोरी हैं और न ही अब माता यशोदा के समान अत्यंत आग्रह करके यह कहने वाली है की बेटा यह खा ले।

सूरदास जी कहते है की श्री कृष्ण से सिक्त वस्तुओं को सुनकर भी उद्धव अपने नियम साधना में निमग्न रहे उनका मन अपने योग मार्ग के विधि विधान में डूबा रहा।

श्री कृष्ण के प्रेम मार्ग को महत्व न देकर उन्होंने इसे हेय समझा योग मार्गी उद्धव का प्रेम मार्ग में ध्यान न देना स्वाभाविक ही था। क्योंकि उनकी दृष्टि में प्रेम भावना सांसारिक मोह मात्र ही था। जिसका तिरस्कार करना ही उचित है।

विशेष :- 
  1. हरि गोकुल प्रीति चलाई पंक्ति से यह ध्वनित होता है की कृष्ण प्रेम प्रसंग की चर्चा चलाकर उद्धव के मन में यह थाह ले रहे हैं साथ ही श्री कृष्ण उद्धव को यह भी बता देना चाहते हैं की ब्रज में व्यर्थ ही योमार्ग की चर्चा न चलाये क्योकि इसका कोई परिणाम नही निकलेगा। 
  2. इस पद से स्पष्ट है की श्री कृष्ण ब्रज को भूले नहीं हैं माता यशोदा के स्नेह दुलार के लिए उनका हृदय बार-बार व्याकुल हो उठता है। 
  3. वह उन्हें भूलने में असमर्थ हैं अंत में उनकी प्रेम की दशा स्पष्ट व्यक्त हुई है। 
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