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भ्रमर-गीत-सार : सूरदास पद क्रमांक 56 की व्याख्या - By Khilawan

Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya

अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने भ्रमर गीत के पद क्रमांक 55 की व्याख्या को अपने इस ब्लॉग questionfieldhindi.blogspot.com में पब्लिस किया था। आज हम भ्रमर गीत पद क्रमांक 56 की सप्रसंग व्याख्या के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या

पद क्रमांक 56 की व्याख्या 
- सम्पादक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

 56. राग मलार

याकी सीख सुनै ब्रज को, रे ?
जाकी रहनि कहनि अनमिल, अलि, कहत समुझि अति थोरे।।
आपुन पद-मकरंद सुधारस, हृदय रहत नित बोर। 
हमसों कहत बिरस समझौ, है गगन कूप खनि खोरे।।
घान को गाँव पयार ते जानौ ज्ञान विषयरस भोरे। 
सूर दो बहुत कहे न रहै रस गूलर को फल फोरे।।

शब्दार्थ :
याकी=इसकी। सीख=योग साधना का उपदेश, शिक्षा। अनमिल=परस्पर विरोधी। आपुन=स्वयं। नित=प्रतिदिन। बोरे=डूबे। बिरस=रसहीन। खानी=खोदकर। खोरे=नहाए। पयार=पयाल, धान का भूसा। विषयरस=प्रेमरस। भोरे=भोले, बावले। फोरे=फोड़ने पर। 

संदर्भ :

प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के भ्रमरगीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। जिसे उन्होंने सूरसागर से सम्पादित किया है। 

प्रसंग :
प्रस्तुत पद में उद्धव की कथनी और करनी को स्पष्ट किया गया है। 

व्याख्या :
क्योकि योग सधना संबंधी निर्गुण ब्रम्ह का उपदेश यहाँ ब्रज में कौंन सुनेगा जिनके रहन सहन और व्यवहार में अर्थात कथनी और करनी में इतना विरोध रहता हो उनकी बातें यहाँ कोई भी सुनना पसंद नही करेगा। 

हे उद्धव तुम स्वयं तो श्री कृष्ण के चरण कमल रूपी मकरंद रूपी अमृत में सदैव अपने हृदय को डुबोये रहते हो और हमसे कहते हो उस कृष्ण को रसीम समझो नीरस समझो खुद तो रस में लीन रहते हो और हमें कृष्ण को रसीम समझने को कहते हो उसी प्रकार असम्भव है जिस प्रकार आकाश में कुआँ खोदकर उसके जल में स्नान करने का प्रयत्न करना। धान के गाँव का परिचय उसके चारो ओर फैले पयाल भाग के पुसे से ही प्राप्त हो जाता है उसी प्रकार तुम्हें देखकर हमें यही लगता है कि तुम स्वयं तो कृष्ण भक्त हो क्योंकि तुम स्वयं उनके चरणों में अनुराग रखते हो और बावले बने हुए हो और फिर क्या यह तुम्हारे लिए उचित है की हम जैसी जो विरहणी जो बालाएँ हैं। उन्हें तुम कृष्ण से विमुख होने का उपदेश देते हो।

तुम्हारी कथनी और करनी में स्पष्ट अंतर् है और इसलिए उचित यही है की तुम हमसे इस विषय में और अधिक चर्चा न करो। 

गूलर का फल फोड़ने से जो स्थिति उतपन्न होती है वह स्थिति उतपन्न हो जाएगी और इसीलिये इस मामले में इस संबंध में हमसे अधिक बातें मत करो। 

गूलर का फल उपर से अत्यंत सुंदर प्रतीत होता है किन्तु उसे फोड़ने पर मरे कीड़े को देखकर विरक्ति उत्पन्न हो जाती है और इसलिए तुम अपनी जो बातें हैं उन्हें गुप्त ही रहने दो हम तुम्हारी जो वास्तविकता है उसे जान रही हैं इसे तुम यदि नहीं खुलवाओगे तो तुम्हारे लिए अच्छा होगा उचित होगा। 

विशेष :
  1. आपुन पद मकरंद सुधारस हृदय रहत नित बोरे में ततगुण है। 
  2. गगन कूप खनि खौरे में दर्शना अलंकार का प्रयोग हुआ है। 
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