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भ्रमर गीत सार : सूरदास पद क्रमांक 2 सप्रसंग व्याख्या By Khilawan

Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya

अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने भ्रमर गीत के पद क्रमांक 1 की व्याख्या को अपने इस ब्लॉग questionfieldhindi.blogspot.com में पब्लिस किया था। आज हम भ्रमर गीत पद क्रमांक 2 की सप्रसंग व्याख्या के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या

पद क्रमांक 2 व्याख्या


Hello दोस्त मैं खिलावन फिर से एक बार स्वागत करता हूँ questionfieldhindi.blogspot.com में.. सूरदास के द्वारा लिखा गया भ्रमरगीत जिसका सम्पादन आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने किया था भ्रमर गीत सार के नाम से आज उसका दुसरा पद कुछ इस प्रकार है....

कहियो नंद कठोर भए। 
हम दोउ बीरै डारि पर घरै मानो थाती सौंपि गए। 
तनक-तनक तैं पालि बड़े किए बहुतै सुख दिखराए। 
गोचारन को चलत हमारे पीछै कोसक धाए।। 
ये बसुदेव देवकी हमसों कहत आपने जाए। 
बहुरि बिधाता जसुमतिजू के हमहिं न गोद खिलाए।। 
कौन काज यह राज, नगर को सब सुख सों सुख पाए ?
सूरदास ब्रज समाधान करूं आंजू काल्हि हम आए।। 

शब्दार्थ - बीरैं=भाई , पर घरै=दूसरे के घर में, थाती=धरोहर या अमानत, तनक-तनक=छोटे-छोटे से, कोसक=एक कोस, धाये=दौड़े आते थे, बहुरि=फिर, जसुमति=यशोदा माता, समाधान=संतावना या तसल्ली, आजु-काल्हि=आज कल में। 

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके रचियता सूरदास जी हैं और सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग - कृष्ण उद्धव को ब्रज जाने से पहले नंद बाबा के लिए जो कह रहे हैं उसका वर्णन इस पद में किया गया है। 

व्याख्या - कृष्ण उद्धव को समझाते हुए कह रहे हैं की हे उद्धव तुम नंद बाबा से कहना की वो इतने कठोर क्यों हो गए हैं। 
हम दोनों भाइयों को अर्थात कृष्ण और बलदाऊ को पराये घर अर्थात मथुरा में हम दोनों से इस प्रकार अलगे जैसे कोई किसी की धरोहर को लौटाकर एकदम से निश्चिंत हो जाता है, और पुनः उसकी कोई खोज खबर नही लेता। कहने का तातपर्य यह है की हम दोनों भाइयों के प्रति उनका अनुराग ही नहीं रह गया है।
आगे श्री कृष्ण कहते हैं की हम जब छोटे-छोटे से थे तब उन्होंने हमारा पालन पोषण किया था पाल पोषकर उन्होंने हम दोनों को अनेक सुख प्रदान किये थे। किन्तु आज उन्हें न जाने क्या हो गया है। जो हमें इस प्रकार विस्मरण कर बैठे हैं। 
और जब हम गाय चराने के लिए वन को जाते थे तो वह हमें छोड़ने के लिए कोष भर हमारे पीछे दौड़े आते थे तब तो हमारे साथ इतना स्नेह था किन्तु अब न जाने उन्हें क्या हो गया है। 
यहां देव और देवकी हमें आत्मज कहते हैं अपना पुत्र कहते हैं ये लोग हमें ब्रम्ह समझ बैठे हैं। 
और कहते हैं की यशोदा माता ने अपनी गोद में नहीं खिलाया। 
श्री कृष्ण आगे कहते हैं की हमने इस नगर के सम्पूर्ण सुखों को भली प्रकार भोग लिया है हमारे लिए यह सुख भोग व्यर्थ है। क्योकि ब्रज के सुखों की तुलना में ये जो सुख है वह महत्वहीन है कोई मूल्य नही। 
सूरदास जी कह रहें हैं की श्री कृष्ण उद्धव से कहते हैं की तुम ब्रजवासियों को हमारा कुशल समाचार कह देना और उनको संतावना देते हुए कहना की हम आजकल में ही अर्थात शीघ्र ही वृन्दावन आकर हम उनसे मिलेंगे। 

विशेष : 
  • सम्पूर्ण पद में स्मृति नामक संचारी भाव का चित्रण अत्यंत मनोरम हुआ है। 
  • ये वसुदेव देवकी पंक्ति में कृष्ण की नवीन नागरिक परिस्थितियों के प्रति विरक्ति नंद यशोदा का वास्तविक माता पिता समझना उनका बालस्वरूप भोलापन आदि विशेषताएं अभिव्यक्त होती हैं। 
  • ये शब्द का प्रयोग कृष्ण का वासुदेव देवकी के प्रति आक्रोश विरक्ति की भावना का परिचायक है और इस प्रकार सम्पूर्ण पद को आकर्षण प्रदान कर रहा है।
  • बहुरि बिधाता जसुमतिजू के हमहिं न गोद खिलाए।। इस पंक्ति का यह अर्थ भी हो सकता है की विधाता ने हमे यशोदा मईया की गोद में पुनः खेलने का अवसर न देकर के परम सुख से वंचित कर दिया है। 
  • प्रस्तुत पद में बालयकालीन मधुर स्मृतियों का यथा तथ्य और हृदय ग्राही वर्णन उपलब्ध होता है।
  • मानो थाती थोप गए में उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग किया गया है। 
यह तो था दुसरा पद इसके पहले मैंने भ्रमर गीत सार से संबंधित जितने भी पोस्ट लिखें हैं उसका लिंक निचे है--
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