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भ्रमर-गीत-सार : सूरदास पद क्रमांक 57 की व्याख्या - By Khilawan

Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya

अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने भ्रमर गीत के पद क्रमांक 56 की व्याख्या को अपने इस ब्लॉग questionfieldhindi.blogspot.com में पब्लिस किया था। आज हम भ्रमर गीत पद क्रमांक 57 की सप्रसंग व्याख्या के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या

पद क्रमांक 57 व्याख्या 
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल

 57. 

निरख अंक स्यामसुंदर के बारबार लावति छाती। 
लोचन-जल कागद-मिसि मिलि कै है गई स्याम स्याम की पाती।।
गोकुल बसत संग गिरिधर के कबहुँ बयारि लगी नहिं ताती। 
तब की कथा कहा कहौं, ऊधो, जब हम बेनुनाद सुनि जाती।।
हरि के लाड़ गनति नहिं काहू निसिदिन सुदिन रासरसमाती। 
प्राननाथ तुम कब धौं मिलोगे सूरदास प्रभु बालसँघाती।।

शब्दार्थ :
संदर्भ=संबंधित। निरख=देखते ही। अंक=अक्षर, पत्री। लावती=लगाती है। लोचन=नेत्र। जल=आँसू। कागदमसि=कागज पर की स्याही। पाती=चिठ्ठी, पत्री। बयारि=हवा। ताती=गरम। बेनुनाद=मुरली की मधुर ध्वनि। लाड़=प्रेम। गनती=गिनती, समझती। काहू=किसी को। निसीदीन=रात दिन। रासरसमति=रास-रंग में उन्मत। बालसंघाती=बालपन के साथी, बालमित्र। 

संदर्भ :
प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। जिसे उन्होंने सूरसागर से लिया है। 

प्रसंग :
गोपियाँ उस पत्र का चर्चा कर रहीं हैं जिसमें श्री कृष्ण ने अपना संदेश भिजवाया था। 

व्याख्या :
उद्धव के हाथों कृष्ण की चिठ्ठी को पाकर वे अत्यंत भाव विभोर हो गई थी उसी समय की स्थिति का वर्णन करते हुए सूरदास जी कहते हैं कि कृष्ण के पत्र में लिखे उनके अक्षरों को देख देखकर गोपियाँ बार-बार उस पत्र को अपने हृदय से लगाने लगी अपनी छाती से लगाने लगी और प्रेमावेश के कारण उनके नेत्रों में उनके आँखों में आँसु आ गए और आँखों से जब आँसू बह रही हैं तो स्याम के द्वारा जो चिट्ठी भेजी गई है वह भीग जाती है और नेत्रों के जल से कागज पर जो लिखा हुआ है उसकी स्याही और नेत्रों का जल आपस में मिल जाने से सारे कागज में स्याही फ़ैल जाती है और उनकी पूरी चिट्ठी काली हो जाती है स्याम अर्थात कृष्ण की पाती है इसलिए काली हो जाती है स्याम अर्थात कृष्ण की पाती है इसलिए काली हो जाती है इस पत्र को निहारते ही गोपियाँ की पूर्व काल की स्मृतियाँ जो है वह साकार हो उठती है। 

जब गोकुल में हम श्री कृष्ण के साथ रहा करती थीं तो हमें कभी वायु की गर्माहट नहीं लगी गोपियाँ कहना चाहती हैं की हमें किसी भी प्रकार का कष्ट नही हुआ हमें कोई भी विपत्ती नहीं आई हे उद्धव हम उस समय की क्या चर्चा तुमसे करें जब हम कृष्ण की मुरली की मधुर ध्वनि सुनकर उनके पास वन में दौड़ी चली जाती थीं और अनेक प्रकार की क्रीड़ाएं उनके साथ किया करती थीं हम कृष्ण के प्रेम में अनेक प्रकार की रास क्रीड़ाएं किया करते थे और उससे आनंदित हुआ करते थे। कृष्ण के प्रेम को पाकर हम इतनी गर्वित होती थीं की अपने सम्मुख किसी को कुछ भी नहीं समझती थीं और इस प्रकार पुरानी बातें याद करके और गोपियाँ अत्यंत भाव विभोर हो गई हैं और कृष्ण को पुकार रहीं हैं। कृष्ण को कहती हैं। 
कि हे प्राणनाथ हे बचपन के साथी आप हमें कब मिलेंगे कब हमें दर्शन देंगे और कब आपका और हमारा मिलन हो सकेगा।

विशेष :

  1. "स्याम-स्याम की पाती" में यमक अलंकार है। 
  2. "लोचन-जल कागद मसि" में ततगुण अलंकार का प्रयोग किया गया है। 
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