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भ्रमरगीत सार : सूरदास पद क्रमांक 83 सप्रसंग व्याख्या By Khilawan

भ्रमरगीत सार आचार्य रामचंद्र शुक्ल 

अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने भ्रमर गीत के पद क्रमांक 82 की व्याख्या को अपने इस ब्लॉग questionfieldhindi.blogspot.com में पब्लिस किया था। आज हम भ्रमर गीत पद क्रमांक 83 की सप्रसंग व्याख्या के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या

  पद क्रमांक 83 व्याख्या 

सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल

bhrmar-geet-sar-surdas-ke-pad - 83

83. 

हरी सों भलो सो पति सीता को।
वन बन खोजत फिरे बंधु-संग किया सिंधु बीता को।।
रावन मारयो , लंका जारी, मुख देख्यो भीता को।
दूत हाथ उन्हैं लिखि न पठायो निगम-ज्ञान गीता को।।
अब धौं कहा परेखो कीजै कुब्जा के माता को।
जैसे चढ़त सबै सुधि भूली, ज्यों पीता चीता को ?
कीन्हीं कृपा जोग लिखि पठयो, निरख पत्र री ! ताको।
सूरदास प्रेम कह जानै लोभी नवनीता को।।

शब्दार्थ - भलो = अच्छा है। बीता को = बीते भर का। भीता = त्रस्त सीता को। पठायो = भेजा। मीता = मित्र का। चिता को = विष पीने वाले ने चेता अर्थात किसी ने भी नही। निरख = देख। ताको = उसका। नवीनता = मक्खन का। 

 संदर्भ - प्रस्तुत पद्यांश  हमारे हिंदी साहित्य के भ्रमरगीत सार से लिया गया है, जिसके संपादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग - विरह-विधुरा गोपियां जब अपने दु:ख में कृष्ण की तरफ से सहानुभूति का एक कण न पा सकी तो अत्यंत दु:खी हो गई और उन्हें विरहानुभूति के क्षणों में सीता की याद हो आई।

व्याख्या - गोपियां सोच रहीं हैं कि राम कितने अच्छे थे कि उन्होंने अपनी पत्नी के लिए अनेक कष्ट सहे परंतु आखिर उन्हें आखिर पाकर ही छोड़ा। इधर हमारे प्रिय कृष्णा कितने बुरे हैं कि प्रेम के बदले में योग का संदेश दे रहे हैं। इसी प्रश्न में वे सोचती विचारती कह रही हैं -

हमारे कृष्ण से तो कहीं अधिक अच्छा पति सीता को मिला था कि उसकी खोज-खबर के लिए वह (राम) वन-वन अपने भाई के साथ खोजता फिरा। इतना ही क्यों इतना विशाल समुद्र उन्होंने अपनी प्रिया को पाने के निमित्त छोटा-सा बना डाला। 

भाव यह है कि सीता के लिए राम ने इतना किया कि समुद्र पर पुल तक तैयार कर दिया किंतु कोई भी वेदना महसूस नहीं की और इधर हमारे कृष्ण हैं कि करना-धरना तो दूर रहा उल्टे जलाने के लिए योग का संदेश और भेज रहे हैं। 
राम ने तो सीता के ही निमित्त रावण का वध किया; लंका दहन कराया और तब कहीं इतने कष्टों के बाद डरी हुई सीता का मुख देखा। 

उन्होंने (सीता ने) भी दूत के माध्यम से संदेश तो भेजा था किंतु वे कितने अच्छे थे कि कोई भी ज्ञान आदि का संदेश नहीं भेजा था। अब तो केवल कुब्जा का ही हाथ उनके ऊपर है कुब्जा के ही वश में हैं। 

वह इस क्षण कुब्जा के प्रेम में पूरी तरह संलग्न हैं और हमें तो इस प्रकार भूल गये हैं जैसे कोई पीने वाला मदिरा के नशे में सभी होश-हवास खो बैठता है? कृष्ण भी कुब्जा के प्रेम नशे में सभी कुछ भूल गए हैं। 

हे सखी हमारे ऊपर तो उन्होंने प्रेम के बदले में यह कृपा की है कि योग का संदेश लिख भेजा है। देख मैं सच कहती हूं तू स्वयं ही इस पत्र को देख ले। वास्तविकता यह है कि वह तो केवल मक्खन का प्रेमी है - प्रेम की सारी स्थितियों से अनभिज्ञ लगता है कि ये तो उनमें से है जो मरने वालों की चिंता नहीं करते हैं और अपना कार्य करते रहते हैं। 

विशेष
  1. उपालंभ की दृष्टि से यह पद श्रेष्ठ है। इसमें चित्तवृत्ति की बड़ी भावमय भावना का प्रस्तुतीकरण किया है।
  2. राम और कृष्ण के आदर्शों की तुलनात्मक प्रणाली के माध्यम से गोपियों का तर्क और भी विशिष्ट बन गया है।
  3. वन-वन में पुनरुक्ति प्रकाश, 'असूया', 'संचारी'  और 'किन्ही कृपा का व्यंग्य बहुत मार्मिक है।
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