Skip to main content

भ्रमर गीत सार : सूरदास पद क्रमांक 23 सप्रसंग व्याख्या By Khilawan

Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya

अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने भ्रमर गीत के पद क्रमांक 22 की व्याख्या को अपने इस ब्लॉग questionfieldhindi.blogspot.com में पब्लिस किया था। आज हम भ्रमर गीत पद क्रमांक 23 की सप्रसंग व्याख्या के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या

पद क्रमांक 23 व्याख्या 

23. राग काफी

आयो घोष बड़ो व्योपारी।
लादी खेप गुन  ज्ञान-जोग की ब्रज में आन उतारी।।
फाटक दैकर हाटक माँगत भौरे निपट सुधारि।
धुर ही तें खोटो खायो है लये फिरत सिर भारि।।
इनके कहे कौन डहकावै ऐसी कौन अजानी ?
अपनों दूध छाँड़ि को पीवै खार कूप को पानी।।
ऊधो जाहु सबार यहाँ तें बेगि गहरु जनि लावौ।
मुँहमाँग्यो पैहो सूरज प्रभु साहुहि आनि दिखावौ।।

शब्दार्थ : घोष=अहीरों की बस्ती। खेप=माल का बोझ। फाटक=फ़टकन, तत्वहीन पदार्थ अनाज को फटकने से निकला हुआ भूषा, फ़टकन। हाटक=स्वर्ण। धारी=समझकर। धूर=मूल। डहकावे=धोखा खाए। अजानी=अज्ञानी। खार=खारा। कूप=कुआँ। सवार=सवेरे। साहुहि=साहूकार,महाजन। आनि=आकर।

संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश हमारे एम. ए. हिंदी साहित्य के पाठ्यपुस्तक के हिंदी साहित्य के द्वितीय सेमेस्टर के प्रश्न पत्र 6 के इकाई 1 सूरदास भ्रमरगीत सार से लिया गया है। जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं।

प्रसंग : निर्गुण ब्रम्ह की उपासना की शिक्षा देने आये उद्धव को गोपियाँ खरी खोटी सुनाती हुई आपस में चर्चा करते हुए कह रही हैं।

व्याख्या : गोपियाँ आपस में बात करती हुई कहती हैं की आज अहीरों की बस्ती में एक बड़ा व्यपारी आया हुआ है। उसने ज्ञान और योग के गुणों से युक्त अपनी जो गठरी है वो लाकर ब्रज में उतार दी है।
उसने हमें तो बिलकुल भोला और अज्ञानी समझ लिया है। क्योकि वह फाटक देकर हाटक चाहता है अर्थात फ़टकन के समान जो तत्व हीन पदार्थ है जो भूषा है जो बेकार का कूड़ा कचरा है वह देकर के उसके बदले में सोना चाहता है अर्थात सोने के समान बहुमूल्य श्री कृष्ण को मांग लिया है।

ऐसा लगता है। इसने आरम्भ से ही लोगों को ठगा है तभी तो इस भारी बोझ को सिर पर लिए घूम रहा है। इस व्यपारी का जो समान है वह बिलकुल व्यर्थ है और इसी कारण यह बिक नही रहा है इसे हानि उठानी पड़ रही है इसका समान कोई भी नही खरीद रहा और इसलिए इसे अपने इस भारी बोझ को लादकर इधर उधर भटकना पड रहा है।

यहां हम में से ऐसी कोन ना समझ है और अज्ञानी है जो इसका माल खरीद कर धोखा खा जाएगी। आज तक ऐसा मुर्ख हमने कहीं नही देखा है जो अपना दूध छोड़कर के और खारे जल के जो कुँए का पानी है उसे वह पिये।
और गोपियाँ अंत में कहती हैं, हे उद्धव तुम शीघ्र ही यहां से चले जाओ बिना देर किये तुम शीघ्र मथुरा चले जाओ और जो तुम्हारा महाजन है तुम्हारा जो बड़ा सेठ है यदि तुम हमसे लाकर मिला दोगे, हमारा दर्शन करा दोगे तो तुम्हें मुँह माँगा पुरस्कार प्राप्त होगा अर्थात जो भी तुम मांगोगे वह हम तुम्हें दे देंगे।

भ्रमरगीत सार की विशेषताएं

  1. इस पद में गोपियों ने उद्धव को व्यपारी बना दिया है। 
  2. जो योग और ज्ञान रूपी तुच्छ वस्तु के लिए उनसे कृष के प्रेम रूपी स्वर्ण मुद्रा ठगना चाहता है। 
  3. कृष्ण के प्रेम को दुग्ध के समान और ज्ञान योग को खारे पानी के समान बताया है। 
  4. भाषा लाक्षणिक और ब्यंजना शब्द शक्ति से सम्पन्न है सम्पूर्ण पद में  अत्यंत तिरस्कृत वाच्य ध्वनि है उद्धव के ज्ञान वस्तु को निस्सार घोषित कर दिया गया है। और उसका तिरस्कार किया गया है। 
  5. फाटक और हाटक में अत्यंत सुंदर शब्द शैली है। 
  6. खोटा खाना मुहावरे का प्रयोग किया गया है।
  7. प्रसाद और माधुर्य गुण से सम्पन्न शैली प्रयोग सूरदास जी के द्वारा किया गया है। 
  8. सम्पूर्ण पद में रूपक और अन्योक्ति का मिश्रित रूप है। 
  9. खार कूप को पानी में दृष्टांत अलंकार का प्रयोग किया गया है। 
  10. गुण ज्ञान खोटो-खायो तथा मुंह मांगी में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है। 

Related Post

भ्रमर-गीत-सार : सूरदास पद क्रमांक 59 व्याख्या सहित

    Comments

    Popular posts from this blog

    भ्रमरगीत सार : सूरदास पद क्रमांक 88 सप्रसंग व्याख्या By Khilawan

       भ्रमरगीत सार आचार्य रामचंद्र शुक्ल  अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने  भ्रमर गीत के पद क्रमांक 87 की व्याख्या  को अपने इस ब्लॉग  questionfieldhindi.blogspot.com  में पब्लिस किया था। आज हम  भ्रमर गीत पद क्रमांक 88 की सप्रसंग व्याख्या  के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय (PRSU) के एम.ए. हिंदी साहित्य (MA Hindi) के पाठ्यक्रम में ' भ्रमरगीत सार ' (संपादक: आचार्य रामचंद्र शुक्ल) द्वितीय सेमेस्टर (Second Semester) के अंतर्गत पढ़ाया जाता है। यह पुस्तक दूसरे सेमेस्टर के मध्यकालीन काव्य प्रश्न-पत्र के पाठ्यक्रम का मुख्य हिस्सा है। भ्रमरगीत सार की व्याख्या     पद क्रमांक 88 व्याख्या  -  सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल bhrmar-geet-sar-surdas-ke-pad - 88 श्री कृष्ण का वचन उद्धव-प्रति 88. राग गौरी ऊधो ! क्यों राखौं ये नैन ?  सुमिरि सुमिरि गुन अधिक तपत हैं सुनत तिहारो बैन।। हैं जो मन हर बदनचंद के सादर कुमुद चकोर। परम-तृषारत सजल स्यामघन ...

    औचित्य सिद्धांत की स्थापनाओं का वर्णन कीजिए।

      प्रश्न 15. औचित्य सिद्धांत की स्थापनाओं का वर्णन कीजिए।  औचित्य सिद्धांत की स्थापनाएं उत्तर-औचित्य शब्द का अर्थ है - उचित का भाव। औचित्य सिद्धांत के संस्थापक आचार्य क्षेमेन्द्र हैं। उन्होंन औचित्य की जो परिभाषा प्रस्तुत की है, उसका अर्थ इस प्रकार है-"जो वस्तु अथवा तत्व किसी के निश्चय ही अनुरूप हो, उसे आचार्यों ने उचित कहा है। उचित का भाव ही औचित्य है।" औचित्य को काव्य का तत्व स्वीकार करते हुए कहा है - "औचित्य रससिद्ध काव्य का स्थिर जीवन है ।"       आचार्य क्षेमेन्द्र ने यह भी कहा है कि औचित्य के बिना अलंकार भी गुणयुक्त नहीं हो सकते । स्त्री पुरुष का उदाहरण देते हुए औचित्य की बात निम्न प्रकार कही है - कंठे मेखलया नितम्बफलके तारेण हारेण वा,  पाणौ नूपुर बन्धनेन चरणे केयूर पाशेन वा। शौर्येण प्रणते रिषौ करुणया नामान्ति के हास्यताम्।  (गले में करधनी, नितम्ब पर लम्बा हार, हाथ में नूपुर और चरणों में नूपुर बांधने से कौन-सी नारी तथा प्रणाम करने वाले के प्रति शूरता, शत्रु पर करुणा से कौन-सा पुरुष हंसी का पात्र नहीं बनता । औचित्य के बिना अल...