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भ्रमर-गीत-सार : सूरदास पद क्रमांक 66 की व्याख्या - By Khilawan

सूरदास भ्रमरगीत सार रामचंद्र शुक्ल

अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने भ्रमर गीत के पद क्रमांक 65 की व्याख्या को अपने इस ब्लॉग rexgin.in में पब्लिस किया था। आज हम भ्रमर गीत पद क्रमांक 66 की सप्रसंग व्याख्या के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या

66. राग मलार

ब्रजजन सकल स्याम-ब्रतधारी।
बिन गोपाल और नहिं जानत आन कहैं व्यभिचारी।।
जोग मोट सिर बोझ आनि कैं, कत तुम घोष उतारी ?
इतनी दूरी जाहु चलि कासी जहाँ बिकति है प्यारी।।
यह संदेश नहिं सुनै तिहारो है मंडली अनन्य हमारी।
जो रसरीति करी हरि हमसौं सो कत जात बिसारी ?
महामुक्ति कोऊ नहिं बूझै, जदपि पदारथ चारी।
सूरदास स्वामी मनमोहन मूरति की बलिहारी।।

शब्दार्थ : ब्रजजन=ब्रजवासी। सकल=सारे। स्याम-ब्रतधारी=कृष्ण प्रेम का व्रत धारण करने वाले। आन=अन्य। मोट=गठरी। घोष=अहीरों की बस्ती-गोकुल। प्यारी=महँगी। तिहार=तुम्हारा। अनन्य=अनोखी, विचित्र। रसरीति=प्रेम-रस-विहार, प्रेम-क्रीड़ाएँ। बिसारी=भुलाई। कत=कैसे। पदार्थ चारी=धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष, नामक चार पदार्थ। 

संदर्भ :

प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के  भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग :

गोपियाँ ब्रज निवासियों के भक्ति का वर्णन कर रहीं हैं। 

व्याख्या :

अगोपियाँ श्री कृष्ण प्रेम के समक्ष मोक्ष को तुच्छ  समझती हैं और गोपियाँ की ही भाँती अन्य ब्रजवासी भी श्री कृष्ण प्रेम धारी हैं और कृष्ण प्रेम के लिए मोक्ष को ठुकरा सकते हैं। 

गोपियाँ कहती हैं, हे उद्धव हमारे  सम्पूर्ण ब्रजवासी भी कृष्ण प्रेम के व्रत को धीरता और दृढ़ता से धारण किये हुए हैं, वे श्री कृष्ण के अलावा और किसी को प्रेम करना तो दूर उसके प्रति आकर्षित भी नहीं हो सकते हम यदि गोपाल के अतिरिक्त अन्य किसी की बात भी करें अर्थात तुम्हारे निर्गुण ब्रम्ह  बातें भी करें तो हम व्यभिचारी कहीं जाएंगी की पतिव्रता नारी किसी अन्य को अपने मन में नही ला सकती और यदि वह ऐसा करती है तो वह व्यभिचारीणी है और हम तो श्री कृष्ण की पतिव्रताएँ हैं और तुम्हारे ब्रम्ह का विचार करके व्यभीचारी नहीं कहलाना चाहती। और 

हे उद्धव तुम अपनी योग की गठरी का भारी बोझ यहाँ अहीरों की बस्ती में गोकुल में लाकर क्यों उतारे हो यहां इस निरर्थक वस्तु का कोई ग्राहक नहीं है। तुम ऐसा करो तुम इसे यहां से दूर काशी ले जाओ वहां के लोग इसे जानते हैं। उसका मर्म समझते हैं और वह यहाँ प्यारी बिक सकेगी। अर्थात महँगी बिक सकेगी हे उद्धव हमारी जो यह मंडली है विलक्षण मंडली है और श्री कृष्ण के प्रेम में निमग्न है और इसलिए यहां तुम्हारा निर्गुण ब्रम्ह संबंधी उपदेश कोई नहीं सुनने वाला हे उद्धव तुम्ही बताओ कृष्ण ने जो यहां हमारे साथ प्रेम लीलाएँ की भी जो रास रचाया था वह कभी भुलाया जा सकता है। 

हे उद्धव हमें तो कृष्ण के प्रेम में ही तुम्हारे उन चारो पदार्थों की प्राप्ति हो चुकी है उन पदार्थों से युक्त युक्ति प्राप्त हो चुकी है और इसलिए निर्गुण ब्रम्ह के मार्ग पर चलकर प्राप्त होने वाली भक्ति का हमारे लिए कोई आकर्षण नहीं है कोई मोल नहीं है हम तो अपने स्वामी श्री कृष्ण की मूर्ति की सुंदर मूर्ति पर प्राण निवछावर किया करती हैं। 

विशेष :

  1. गोपियों को कृष्ण प्रेम से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष नामक ये चारो पदार्थ प्राप्त थे अतः निर्गुण ब्रम्ह को इसके अपनाने से केवल मोक्ष ही प्राप्त होता वे इसे निरर्थक सा समझती थीं। 
  2. प्रादेशिक प्रयोग है जिसका पंजाब में प्रचलन है प्यारी का अर्थ महँगी से है। 
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