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भ्रमर-गीत-सार : सूरदास पद क्रमांक 68 की व्याख्या - By Khilawan

अगर आप हमारे ब्लॉग को पहली बार विजिट कर रहे हैं तो आपको बता दूँ की इससे पहले हमने भ्रमर गीत के पद क्रमांक 67 की व्याख्या को अपने इस ब्लॉग में पब्लिस किया था। आज हम भ्रमर गीत पद क्रमांक 68 की सप्रसंग व्याख्या के बारे में जानेंगे तो चलीये शुरू करते हैं।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या

 68. राग रामकली

ऐसेई जन दूत कहावत !
मोको एक अचंभी आवत यामें ये कह पावत ?
बचन कठोर कहत, कहि दाहत, अपनी महत्त गवावत।
ऐसी परकृति परति छांह की जुबतिन ज्ञान बुझावत।।
आनुप निजल रहत नखसिख लौं एते पर पुनि गावत।
सूर करत परसंसा अपनी, हारेहु जीति कहावत।।

शब्दार्थ :

ऐसेइ=ऐसे। जन=आदमी। मोको=मुझे या में=इसमें। महत्त=महत्ता, गुरुत्व, सम्मान। परकृति=प्रकृति संसर्ग अथवा छाया का प्रभाव। जुवतिन=युवतियों, अबलाओं, गोपियों को। बुझावत=समझाते हैं। आपुन=स्वयं। निलज=निर्लज्ज। नखसिख-लौ=ऊपर से नीचे तक पूरी तरह। एते पर=इतने पर भी। गावत=चर्चा करते हैं। परसंसा=प्रसंसा। हारेहु=हार। 

संदर्भ :

प्रस्तुत पद्यांश हमारे हिंदी साहित्य के  भ्रमर गीत सार से लिया गया है जिसके सम्पादक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी हैं। 

प्रसंग :

गोपियाँ योग का संदेश लाने वाले उद्धव पर कटाक्ष कर रहीं हैं। 

व्याख्या :

गोपियों के मत में सफल दूत वहीं हैं जो वास्तविक संदेश न कहकर दिन भर की झूटी बातें बढ़ चढ़कर सुनाया करते हैं। गोपियाँ उद्धव के संदेश पर संदेह करती हुई और उसके योग पर व्यंग्य करती हुई आपस में बातचीत करती हैं और कहती हैं "ऐसेई जन दूत कहावत।" ऐसे ही लोग सफल दूत कहे जाते हैं जो वास्तविक संदेश न कहकर इधर-उधर की बातें करके सुनाया करते हैं।

मुझे एक बात का आश्चर्य है की ऐसा करने पर अर्थात योग का संदेश सुनाकर हमें संतप्त करने पर इन्हें क्या लाभ होता है? ऐसे लोग दूसरों से कठोर वचन कहते हैं जैसे ये उद्धव हमें कृष्ण को भुलाकर निर्गुण ब्रम्ह की उपासना करने को कह रहे हैं और इस प्रकार के वचनों से दूसरों को दुखी करते हैं संतप्त करते हैं और इस प्रकार अपनी महत्ता और सम्मान भी गवां बैठते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति पर संगीत का प्रभाव पड़ता है जिसके कारण वह बौरा जाता है पागल हो जाता है और उटपटांग बातें करने लगता है देख लो उद्धव को ये इस बात के साक्षात प्रमाण हैं कुब्जा के संगत में रहने के कारण इसकी बुद्धि भ्रस्ट हो गई है और जिसके कारण ये अबलाओं को योग और निर्गुण ब्रम्ह की शिक्षा देने यहां पर आ गए हैं इन्हें यह समझ ही नहीं आ रहा की इनका कार्य कितना अनुचित है। 

ऐसे लोग पूर्णतः निर्लज होते हैं और अपनी निर्लज्ज कार्यों के लिए निर्लजता का अनुभव करके अपनी ही हाँके चले जाते हैं ये लोग स्वयं ही अपनी प्रसंसा करते करते अपनी हार को भी जीत कहते हैं अपनी पराजय को भी विजय कहते हैं। 

ये उद्धव ज्ञान में विवेक में हमसे हार चुके है। क्योंकि एक बात का तो उत्तर नहीं दे पाते फिर भी वह स्वयं को विजयी घोषित कर रहे हैं और निररंतर निर्गुण ब्रम्ह से संबंधित अपनी रट लगाए हुए हैं। 

विशेष :

  1. प्रस्तुत पद में उध्दव के साथ साथ कुब्जा पर भी व्यंग्य किया गया है। 
  2. कुब्जा स्वयं निर्लज है जो हमारे प्रेम को खुद भोग रही है और उसके समीप रहकर उद्धव भी निर्लज्ज हो गए हैं और अपनी हार को भी जित का दर्जा दे रहे  हैं। 
  3. कठोर कहत कहि में वृत्यानुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है।

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